दुमका: समाजसेवी सच्चिदानंद सोरेन द्वारा विभिन्न आदिवासी गांवों में कुल्ही दुरुप(बैठक) कर ग्रामीण बच्चों को नशा से बचा कर रखने और नशा से समाज में होने वाले दुष्प्रभावों को लेकर जागरूक किया गया। उन्होंने इस क्रम में आदिवासी समाज में अपने धर्म, संस्कृति एवं पारंपरिक पर्व-त्योहारों के संरक्षण हेतु जागरूकता अभियान चलाया है। इसी क्रम में दुमका प्रखंड के माचखिचा गांव में समाजसेवी सच्चिदानंद सोरेन की पहल पर गांव के मंझी बाबा राजा मरांडी की अध्यक्षता में बैठक (कुल्ही दुरुप) आयोजित की गई।
बैठक को संबोधित करते हुए सच्चिदानंद सोरेन ने कहा कि संताल परगना के अधिकांश आदिवासी गांवों में बुजुर्गों की संख्या लगातार कम होती जा रही है, जिसका प्रमुख कारण अत्यधिक नशापान है। उन्होंने कहा कि आज छोटे-छोटे बच्चे भी नशे की चपेट में आ रहे हैं, जो समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है। ग्रामीणों ने स्वीकार किया यह एक बड़ी समस्या है।
समाजसेवी सोरेन ने आगे कहा बच्चों को नशा से बचाने के लिए गांव के बाहर से कोई नहीं आएगा। ये हमारे गांव के बच्चे हैं, अपने घर के बच्चे हैं, इसलिए हम सभी माता-पिता, परिजन और गांव के ही लोग आगे आकर बच्चों को नशापान से बचा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि बच्चे जो देखते हैं, वही सीखते हैं, इसलिए सभी माता-पिता यह शपथ लंे कि बच्चों के सामने न तो नशापान करेंगे और न ही बच्चो को दारू लाने के लिए कहेंगे, क्योंकि जब बच्चे अपने माता-पिता को नशापान करते देखते हैं तो बच्चे के मन में घर कर जाता है कि दारू पीना ठीक है, क्यांेकि हमारे माता-पिता दारू पीते हैं।
सच्चिदानंद सोरेन के आग्रह पर पर सभी ग्रामीणों ने शपथ लिया कि अब से बच्चों के सामने न तो नशा करेंगे और न ही बच्चों से दारू मंगवाएंगे।

उन्होंने कहा कि अधिकतर गांवों में सोहराय, बाहा आदि पर्व में पूजा के समय सिर्फ लेखा होड़ (गांव को चलाने वाले) रहते हैं, अन्य ग्रामीण पूजा के समय नहीं रहते हैं, यह चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि सोहराय, बाहा आदि पर्व पुरे गांव का पर्व है। इस पूजा में सभी बच्चे और ग्रामीणों को अवश्य भाग लेना चाहिए। अगर आज हम सभी और हमारे बच्चे पूजा में भाग नहीं लेंगे, तो भविष्य में नये पीढ़ी तक यह परंपरा, धर्म और संस्कृति आगे नहीं जा सकेगी, जिससे संताल आदिवासियों की पूजा पद्धति, धर्म, संस्कृति एवं परंपरा धीरे-धीेरे लुप्त हो जाएगी। इसलिए युवा पीढ़ी और बच्चों का सांस्कृतिक व धार्मिक आयोजन में भाग लेना जरूरी है।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आजकल बच्चे, बड़े लोग मंझी थान एवं जाहेर थान जैसे पवित्र स्थलों के पास से गुजरते समय डोबोह(प्रणाम)नहीं करते, जो सांस्कृतिक मूल्यों में गिरावट को दर्शाता है। इस पर ग्रामीणों ने अपनी गलती स्वीकार की और सुधार का संकल्प लिया कि आगे वे से ऐसा करेंगे।
सोरेन ने कहा हमारे संताल गांव में वैसा व्यवस्था नहीं है कि घर में कोई दुःख तकलीफ होने पर मंझी थान में जाकर लोग इष्ट देवी-देवता से सुख शांति के लिए प्रार्थना कर सकें। गांव में ऐसी व्यवस्था नहीं होने के कारण हमारे अपने लोग कोई दुःख-तकलीफ होने पर बाहर जाकर घर के सुख शांति के लिय प्रार्थना/पूजा करते हैं।

समाज को इस स्थिति से बचाने के लिय श्री सोरेन ने प्रत्येक रविवार को सभी महिला, पुरुष, बच्चे, बुजुर्ग से मिलकर मंझी थान में साप्ताहिक सामूहिक पूजा प्रारंभ करने का प्रस्ताव रखा। इससे बच्चे अपने पूजा, पर्व और संस्कृति को जान सकेंगे और बच्चो को सकारात्मक जीवन मूल्यों की ओर प्रेरित करने के लिए विशेष विनती(प्रार्थना) की जाएगी। इससे नशा से दूर रहने, नियमित रूप से विद्यालय जाने, माता-पिता एवं बुजुर्गों की सेवा और सम्मान करने और सामाजिक कार्याे में भाग लेने का संदेश दिया जाएगा। इसके साथ साथ बड़े-बुजुर्ग, माता-पिता अपने घर के सुख शांति के लिए मंझी थान में पूजा व प्रार्थना करने का अवसर प्राप्त होगा। समाजसेवी सच्चिदानंद सोरेन ने आतु लेखा होड़(गांव को चलाने वाले) और ग्रामीणों से पूछा कि क्या मंझी थान में महिला पूजा कर सकती हैं? इस पर सभी ने एक स्वर में कहा कि हाँ मंझी थान में महिलाएं भी पूजा कर सकती हैं।
गांव के मंझी बाबा, आतु लेखा होड़ एवं सभी ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से साप्ताहिक रविवार पूजा प्रारंभ करने का समर्थन किया और इसे शीघ्र लागू करने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि साप्ताहिक मंझी थान पूजा ही सामुदायिक एकता, आध्यात्मिक शांति तथा सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में मददगार होगी और आगे नई पीढ़ी तक पहुंचाएगी। इससे विशेष रूप से युवा पीढ़ी और बच्चों को अपनी परंपरा और संस्कृति से जोड़ने में मदद मिलेगी, ताकि वे अपने रीति-रिवाजों को समझें, उनका सम्मान करें और उस पर गर्व महसूस करें।
सप्ताहिक मंझी थान पूजा संताल समाज के लिए आगे चलकर मील का पत्थर साबित होगी। साप्ताहिक मंझी थान पूजा हर रविवार के दिन को इसलिए रखा गया है क्यांेकि इस दिन बच्चों का स्कूल बंद रहता है, ताकि बच्चे पूजा में भाग ले सकंे। इस अवसर में पालटन हेम्ब्रोम, सुशील मरांडी, बुधन हांसदा, मोनुह मुर्मू, जीवन टुडू, जय मुर्मू, एलीजाबेथ मरांडी, सुकुरमुनि टुडू, सोहागनी मरांडी, चुड़की मुर्मू, हिरामुनी टुडू, बिटीया सोरेन, मकु मुर्मू, बाबुसोल हांसदा के साथ काफी संख्या में महिला, पुरुष, बुजुर्ग और बच्चे उपस्थित थे।