प्रशासन की उदासीनता के बाद लोगों ने खुद हिजला मेले में लगाया संताली व ओलचिकी का बैनर

दुमका: झारखंड के दुमका जिले के शहर के करीब स्थित हिजला गांव में लगने वाला हिजला मेला राज्य में आदिवासी संस्कृति को प्रस्तुत करने वाला 136 वर्ष पुराना राजकीय मेला है। इस मेले में स्थानीय लोगों ने निजी खर्च पर संताली भाषा व ओलचिकी लिपि में बैनर लगवाए हैं। यह मेला विशेष रूप से आदिवासियों की संस्कृति के संरक्षण, पारंपरिक कला, नृत्य, संगीत एवं रीति-रिवाजों के प्रदर्शन तथा प्रशासन और आदिवासी समुदाय के बीच सीधा संवाद स्थापित करने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया था।

हिजला गांव के ग्रामीणों एवं संताल समाज के विभिन्न सामाजिक संगठनों ने ग्राम सभा आयोजित कर दुमका के उपायुक्त सह मेला अध्यक्ष एवं अनुमंडल पदाधिकारी सह मेला समिति सचिव को मेला पूर्व लिखित आवेदन सौंपा था। उक्त आवेदन में मांग की गई थी कि मेले से संबंधित सभी सरकारी बैनर, पोस्टर एवं प्रचार सामग्री हिंदी के साथ-साथ संताली भाषा की अपनी लिपि ओलचिकी में भी प्रकाशित की जाए, ताकि संताल समुदाय की भाषा, संस्कृति और लिपि को बढ़ावा मिल सके।

मेला समिति से आश्वासन मिलने के बावजूद संताली भाषा व ओलचिकी लिपि में बैनर नहीं लगाया गया। जबकि संताल बहुल क्षेत्रों में सरकारी कार्यालयों एवं भवनों के नाम पट्टों पर संताली भाषा की ओलचिकी लिपि में भी अंकित करने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त झारखंड के अन्य सरकारी आदिवासी कार्यक्रमों में हिंदी के साथ-साथ ओलचिकी लिपि में भी बैनर लगाए जाते हैं। बावजूद इसके, दुमका में हिजला मेला समिति द्वारा आवेदन दिए जाने के बाद भी संताली ओलचिकी बैनर/पोस्टर नहीं लगाए गए।ग्रामीणों ने यह भी उल्लेख किया कि हाल ही में 25 दिसंबर 2025 को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू द्वारा भारतीय संविधान का संताली भाषा की ओलचिकी लिपि में प्रकाशित संस्करण का विमोचन किया गया था। इसके अतिरिक्त 16 फरवरी 2026 को ओलचिकी लिपि के आविष्कारक पंडित रघुनाथ मुर्मू के नाम पर डाक टिकट और 100 रुपये का स्मारक सिक्का भी जारी किया गया।

इन महत्वपूर्ण पहलों के बावजूद हिजला मेला समिति द्वारा संताली ओलचिकी लिपि को मेले में स्थान नहीं दिए जाने से ग्रामीणों एवं संताल समाज में नाराजगी व्याप्त है। इसी से क्षुब्ध होकर हिजला गांव के ग्रामीणों एवं संताल समाज के लोगों ने अपने निजी खर्च से हिंदी के साथ-साथ संताली भाषा की ओलचिकी लिपि में दो बैनर छपवाकर मेले परिसर में लगाया गया, ताकि अपनी मातृभाषा संताली और ओलचिकी लिपि को सम्मान मिल सके। इस अवसर पर इमानवेल हासदा, लाल हांसदा, बुद्धिलाल मरांडी, दिलीप सोरेन, प्रदीप हांसदा, विनय हांसदा, जय गणेश हांसदा, डेविड सोरेन, नरेश हेम्ब्रोम, आनंद हेम्ब्रम, बिमल हेम्ब्रोम सहित अन्य ग्रामीण एवं समाज के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

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