भारत के ऊर्जा परिवर्तन में हाशिये पर बिहार के मुसहर परिवार

बिहार के गया जिले में महादलित परिवार अभी भी धुएँं वाली लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाते हैं, जबकि गोबरधन योजना के तहत पास में ही बायोगैस संयंत्र स्थापित हो रहे हैं।

युशा रहमान की रिपोर्ट

गया: बिहार के गया ज़िले के बिहार्गेन गांव में बिहार के सबसे गरीब लोगों में से एक महादलित वर्ग में सूचीबद्ध मांझी समुदाय की महिलाएं अपनी आँखों में धुएँ के साथ अपना दिन शुरू करती हैं।

झोपड़ीनुमा उनका घर रानीगंज कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) संयंत्र से मुश्किल से 50 किलोमीटर और एक छोटे सामुदायिक बायोगैस संयंत्र से केवल तीन किलोमीटर दूर हैं। फिर भी, उनमें से किसी की भी खाना पकाने के स्वच्छ ईंधन तक पहुँच नहीं है।

मीना देवी (32) ने कहा, “हम जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठा करने जाते हैं और फिर उन्हें जलाकर खाना बनाते हैं। उनके पति राजमिस्त्री का काम करते हैं और परिवार लगभग ₹12,000 प्रति माह कमाता है।  वे कहती हैं, “हमारे लिए रसोई गैस का खर्च उठाना संभव नहीं है, और हमें कोई बायोगैस कनेक्शन नहीं दिया गया है”।

उनकी पड़ोसी, 45 वर्षीय जीतनी देवी भी यही कहानी सुनाती हैं। उन्होंने कहा, “हमें एक बार रसोई गैस सिलेंडर मिला था, लेकिन सिर्फ़ पहली बार ही गैस भरवाई गई। उसके बाद, हम उसे नहीं खरीद पाए। धुएँ से मुझे खांसी आती है और आँखों में जलन होती है”।

कुछ ही किलोमीटर दूर, गाय के गोबर से अमीर किसानों के लिए स्वच्छ गैस बनाई जाती है। जीतनी ने आगे कहा, “हमने गोबरधन गैस योजना के बारे में सुना है, लेकिन हमें ऐसी सुविधा कभी नहीं मिली”।

एक ऐसी योजना जो गरीबों को नज़रअंदाज़ करती है

2018 में स्वच्छ भारत मिशन के तहत शुरू किया गया गोबरधन या कचरे से धन कार्यक्रम मवेशियों के गोबर और फसल अवशेषों को बायोगैस और खाद में बदलने के लिए था। इसका उद्देश्य था – घरों के लिए स्वच्छ ईंधन और खेतों के लिए जैविक खाद।

अक्टूबर 2024 तक, पूरे भारत में 1,340 बायोगैस संयंत्र पंजीकृत हो चुके हैं, जिनमें से 14 बिहार में कार्यरत हैं। राज्य में इसका कार्यान्वयन जीविका (बिहार ग्रामीण आजीविका संवर्धन समिति) द्वारा किया जाता है।

अधिकारियों ने बताया कि 60 घन मीटर का एक बायोगैस संयंत्र 25 से 30 परिवारों को रोज़ाना खाना पकाने के लिए गैस प्रदान कर सकता है, जिससे ग्रामीण समुदायों में अपशिष्ट से ऊर्जा प्रणालियों को बढ़ावा मिलता है।

पंचायती राज विभाग के बिहार राज्य पंचायत संसाधन संगठन के ओपी सांकृत्यायन ने कहा, “एक घन मीटर गैस बनाने के लिए लगभग 20 किलोग्राम गोबर की आवश्यकता होती है। जिनके पास गायें हैं, वे आस-पास के संयंत्रों को गोबर बेचते हैं और उससे कुछ आय अर्जित करते हैं”।

लेकिन इस योजना का डिज़ाइन उन लोगों के लिए अनुकूल है जिनके पास पहले से ही ज़मीन और पशुधन है। घरों के लिए बनाई गई सबसे छोटी इकाइयों के लिए प्रति परिवार कम से कम तीन मवेशियों की आवश्यकता होती है। क्लस्टर और सामुदायिक संयंत्र कई किसानों से एकत्रित गोबर पर निर्भर करते हैं। सबसे गरीब व सामान्यतः भूमिहीन महादलितों के पास इनमें से एक भी नहीं होता।

बिना पशुधन के महादलित परिवार गोबरधन योजना के तहत बायोगैस का लाभ हासिल करने से वंचित हैं। फोटो: युशा रहमान/101reporters

महादलित शब्द 2007 में बिहार सरकार द्वारा अनुसूचित जातियों के भीतर सबसे गरीब और सबसे हाशिए पर पड़े उप-समूहों की पहचान करने के लिए गढ़ा गया था। यह श्रेणी, जो संवैधानिक वर्गीकरण का हिस्सा नहीं है, दलितों के भीतर भी अत्यंत पिछड़े समुदायों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए बनाई गई थी। महादलित बिहार की आबादी का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा हैं और आम तौर पर भूमिहीन हैं, जो प्रमुख जाति समूहों के लिए बटाईदार या दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं।

2001 की जनगणना के अनुसार, 92 प्रतिशत से अधिक मुसहर भूमिहीन हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि 98 प्रतिशत मुसहर परिवारों के पास कोई पशुधन नहीं है, बाकी बकरियाँ पालते हैं, जिनका मल बायोगैस के लिए उपयुक्त नहीं है। सांकृत्यायन ने कहा, बकरी के मल में नमी की कमी होती है। सिर्फ़ एक घन मीटर गैस बनाने के लिए इसे भिगोना पड़ता है और बड़ी मात्रा में (12 किलोग्राम) इसकी ज़रूरत होती है। यह संभव नहीं है।

चक्रीय अर्थव्यवस्था में अस्थायी उपाय

यह मॉडल एक चक्रीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जिसमें गोबर को कारखानों को बेचा जाता था, बायोगैस को खाना पकाने के लिए पाइप के ज़रिए वापस भेजा जाता था, और बचे हुए घोल को खाद के रूप में दोबारा इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन पशुधन के बिना, महादलितों के पास इस चक्र में प्रवेश का कोई रास्ता नहीं है।

स्वयंभू इनोवेटिव सॉल्यूशंस की सह-संस्थापक आकांक्षा सिंह ने कहा, “किराए पर ज़मीन ली जाती थी, गोबर खरीदा जाता था, और बायोगैस, बिजली और घोल जैसे उप-उत्पाद समुदाय को वापस बेचे जाते थे… यही विचार था। लेकिन इसका लाभ ज़्यादातर उन प्रभावशाली जातियों को मिलता है जिनके पास मवेशी और खेत हैं।”

उनकी संस्था ने एक बार गया के दलित परिवारों के लिए इस मॉडल को अपनाने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा, “हमने सब्सिडी वाले बायोगैस कनेक्शन देने के लिए 22 लाख रुपये जुटाए।” “चूँकि उनके पास गायें नहीं थीं, इसलिए हमने आस-पास के गाँवों और विश्वविद्यालयों से गोबर मँगवाया।” परिवारों ने रसोई गैस के लिए 30 रुपये प्रति माह का भुगतान किया, जबकि घोल की बिक्री से परियोजना तब तक चलती रही जब तक आपूर्ति श्रृंखला टूट नहीं गई।

पायलट प्रोजेक्ट के तहत स्थापित किया गया एक बायोगैस संयंत्र, जिसका लाभ अधिकतर गैर महादलित परिवारों को होता है और महादलित इसके लाभ से वंचित हैं। फोटो: युशा रहमान/101reporters

उन्होंने कहा, “जब पूसा विश्वविद्यालय ने गोबर भेजना बंद कर दिया, तो स्थानीय लोगों ने उसमें राख मिलानी शुरू कर दिया। इससे चैंबर जाम हो गए और प्लांट बंद हो गए। मवेशियों के स्वामित्व के बिना, यह मॉडल सबसे गरीब लोगों के लिए व्यवहार्य नहीं है।”

गोबरधन का उद्देश्य ग्रामीण भारत में स्वच्छ और विकेन्द्रीकृत ऊर्जा लाना था। लेकिन बिहार्गेन जैसी जगहों पर, इसने पुराने पदानुक्रम को और मज़बूत किया है, जिसके कारण ग्रामीण बिहार में ऊर्जा की पहुँच अभी भी जाति और वर्ग के विभाजन को दर्शाती है।

पटना के धनरुआ ब्लॉक के ओयारा गाँव में, 60 घन मीटर का एक बायोगैस प्लांट रोज़ाना 1,500 किलोग्राम गोबर प्रोसेस करता है और 22 घरों को गैस की आपूर्ति करता है। गाँव में यादव समुदाय का वर्चस्व है, जो पारंपरिक रूप से मवेशी मालिक हैं, जबकि दलित आबादी का लगभग 23% हिस्सा हैं।

सरपंच सरोज देवी ने कहा, “हम 50 रुपये प्रति किलो की दर से गोबर खरीदते हैं। यहाँ ज़्यादातर परिवारों के पास गायें हैं और वे रोज़ाना 40-50 किलो गोबर देते हैं।” जिन परिवारों के पास मवेशी नहीं हैं, वे गैस के लिए प्रतिदिन 20 रुपये देते हैं, जबकि गोबर देने वालों को यह रियायती दरों पर मिलती है। “अगर कोई गैस की कीमत से ज़्यादा गोबर देता है, तो हम उन्हें अंतर का भुगतान करते हैं।”

प्रायोगिक रूप से स्थापित इस संयंत्र से मुख्य रूप से आस-पास के परिवारों को लाभ मिलता है, जिनमें से ज़्यादातर प्रभावशाली जातियों से हैं। सरोज ने स्वीकार किया, “महादलित समुदाय के लोग बाहरी इलाकों में रहते हैं, इसलिए उन्हें गैस नहीं मिलती।” यहाँ भी, यह परियोजना दस महीनों से बंद पड़ी है। उन्होंने कहा, “संचालक को 7,000 रुपये प्रति माह का भुगतान किया जाता था। अब उसे देने के लिए पैसे नहीं हैं, इसलिए संयंत्र बंद हो गया।”

एक प्रणालीगत बहिष्कार

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मॉडल ज़मीन, मवेशियों और पूँजी के स्वामित्व पर आधारित होते हैं, जो व्यवस्थित रूप से गरीबों को बाहर कर देते हैं। राज्य अक्षय ऊर्जा एजेंसी के एक अधिकारी ने कहा, “पूरी मूल्य श्रृंखला यह मानती है कि लोगों के पास पशुधन है। महादलितों या भूमिहीन मज़दूरों के लिए यह सही नहीं है।”

इस बहिष्कार की कीमत सिर्फ़ आर्थिक नहीं है। महादलित परिवारों के लिए, लकड़ी और उपलों पर निर्भरता का मतलब है ईंधन इकट्ठा करने में घंटों बिताना और ज़हरीले धुएँ में साँस लेना।

अध्ययनों से पता चलता है कि अनुसूचित जनजातियाँ और जातियाँ ठोस ईंधन पर सबसे ज़्यादा निर्भर हैं और तपेदिक जैसी श्वसन संबंधी बीमारियों की दर भी सबसे ज़्यादा है। जलाऊ लकड़ी और उपलों से होने वाले घरेलू वायु प्रदूषण के कारण महिलाओं और बच्चों में 565 µg/m³ तक के कण पदार्थ और सुरक्षित सीमा से कहीं ज़्यादा कार्बन मोनोऑक्साइड का स्तर पहुँचता है।

बिहार सरकार ने 2025 के अंत तक 1,500 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश से दस नए संपीड़ित बायोगैस संयंत्र स्थापित करने की योजना की घोषणा की है। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इसे “एक स्वच्छ और आत्मनिर्भर बिहार की ओर एक कदम” बताया।

लेकिन जीतनी देवी और मीना देवी जैसी महिलाओं के लिए यह ऊर्जा बदलाव अभी भी पहुँच से बाहर है। बिहार्गेन की एक और निवासी झलवा देवी ने कहा, “पास में एक गोबर गैस प्लांट है। लेकिन हमें इससे कोई फायदा नहीं होता। मैं बस यही उम्मीद करती हूँ कि किसी दिन हमें बायोगैस मिल जाए, ताकि हम इस धुएँ के बिना खाना बना सकें जो रोज़ हमारी आँखों को जलाता है।”

(यह स्टोरी हमने 101reporters से साभार प्रकाशित की है। की वेबसाइट पर इस स्टोरी को अंग्रेजी में पढने के लिए इस लिंक को क्लिक करें।)

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