हिमाचल प्रदेश में 11 साल की लंबी अवधि में तेंदुओं द्वारा किये गए हमले की प्रकृति व स्वरूप पर एक अध्ययन में इसके विभिन्न पक्षों का खुलासा हुआ है। इस अध्ययन में पाया गया है कि आजीविका के लिए बाहर अधिक वक्त गुजारने वाले व शारीरिक रूप से तेंदुओं के शिकार के दायरे में आने वाले उसके अधिक आसान शिकार होते हैं।
भारत के उत्तरी पर्वतीय राज्य हिमाचल प्रदेश में मानव-तेंदुए संघर्ष के 11 साल की लंबी अवधि पर किए गए एक अध्ययन में तेंदुओं द्वारा किये गए 344 हमलों का दस्तावेजीकरण किया गया है और हमले के स्वरूप, प्रभावित वर्ग व उसके प्रभावों का अध्ययन किया गया है। ह्यूमन डाइमेंशन ऑफ वाइल्डलाइफ मे आठ जनवरी 2025 कों प्रकाशित यह विस्तृत अध्ययन श्वेता शिवकुमार की अगुवाई में किया गया है। सेंटर ऑफ वाइल्डलाइफ स्टडीज और मणीपाल एकेडमी ऑफ हाइयर एडुकेशन के अपने डॉक्टरल शोध के हिस्से के रूप में चाटिंग रिस्क पथवे ऑफ लैपॉर्ड एटेक्स ऑन पिपुलः ए डिसिजन ट्री अप्रोच (Charting risk pathways of leopard attacks on people: A decision tree approach )नामक स्टडी में श्वेता शिवकुमार की अगुवाई में रिसर्च टीम ने हिमाचल प्रदेश में मनुष्यों पर तेंदुए के हमलों के जोखिम कारकों और परिणामों की पड़ताल की है, जिसमें शारीरिक चोट से लेकर उसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव के पक्ष को शामिल किया गया है।
इस रिसर्च से पता चलता है कि मनुष्यों पर तेंदुओं के 74 प्रतिशत हमले गैर हमलावर थे, जिसके परिणामस्वरूप आम तौर पर मामूली चोटें आयीं। हालांकि 26 प्रतिशत मामलों में तेंदुए हमलों के लिए जिम्मेवार थे और चोट कहीं अधिक गंभीर थे, जिनमें सात प्रतिशत यानी 24 मामले 15 साल से कम उम्र के किशोर उम्र के लोगों पर हुए।

Photo – Avijan Saha Via CWS.
अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि किशोरों में उनके आकार के कारण वयस्कों की तुलना में घातक व गंभीर चोटों को अनुभव करने की संभावना लगभग 88 प्रतिशत अधिक थी। शोधकर्ताओं ने इस किशोंरों के आकार से जोड़ा है जो तेंदुओं के सामान्य शिकार के वजन की सीमा के अंदर आता है। गैर शिकारी हमलों की तुलना में शिकार के लिए किए गए हमलों में गंभीर चोटों या मौतों की संभावना अधिक थी। इस मामले में पीड़ित की उम्र महत्वपूर्ण होती है, जिसमें किशोरों को वयस्कों की तुलना में असमान रूप से अधिक जोखिम का सामना करना पड़ा। इस अध्ययन के प्रमुख निष्कर्षाें से यह भी पता चला कि हमले मुख्य रूप से रात में और खेती या पशु चराने जैसी नियमित गतिविधियों के दौरान हुए।
कम आय वाले परिवार के व्यक्ति जो पीड़ितों का 66 प्रतिशत या दो तिहाई हिस्सा थे, वे बाहरी आजीविका गतिविधियों के दौरान उनके बढते जोखिम के कारण असमान रूप से प्रभावित हुए। इस अध्ययन में हमले के परिणामों को प्रभावित करने वाले तीन प्रमुख कारकों की पहचान की गई है – एक हमले की प्रकृति शिकारी या गैर.शिकारी, पीड़ित की आयु और स्थानीय टकराव वाले हॉटस्पॉट से निकटता।
इस रिपोर्ट के सह लेखकों में डॉ विद्या आत्रेय (Dr. Vidya Athreya, Wildlife Conservation Society- India), निकिता यार्डी (Nikita Yardi, Tata Institute of Social Sciences, India), डॉ मोर्टेन ओडेन (Dr. Morten Odden, Inland Norway University of Applied Sciences, Norway), सत पाल धीमान (Sat Pal Dhiman, Government of Himachal Pradesh) और डॉ कृति के कारथ (Dr. Krithi K. Karanth, Centre for Wildlife Studies, and Duke University) शामिल हैं।

फील्ड वर्क के दौरान हिमाचल प्रदेश के एक ग्रामीण इलाके में रिसर्चर श्वेता शिवकुमार। फोटो क्रेडिट – सीडब्ल्यूएस।
रिपोर्ट की लीड ऑथर श्वेता शिवकुमार कहती हैं, “इस अध्ययन में पाया गया कि तेंदुओं के ज्यादा हमले गैर शिकारी यानी बिना शिकार के उद्देश्य थे और इससे मामूली चोटें आईं और दुर्भाग्य से 60 प्रतिशत हमले निम्न आय वाले लोगों पर हुए जो ज्यादातर समय आजीविका के लिए बाहर पशुओं को चराने, लकड़ी जमा करने, पैदल चलने या अन्य वजहों से बाहर बिताते हैं। ऐसे परिवारों को बेहतर सहायता देने की जरूरत है जो इस परिदृश्य में संघर्ष का सामना करते हैं”।
इस अध्ययन में हिमाचल प्रदेश के निवासियों पर तेंदुओं के हमले के पूरे जीवन में जोखिम की भी गणना की गई। अध्ययन में पाया गया कि 10 लाख लोगों में 9.96 प्रतिशत लोगों ने तीव्र प्रभाव वाले हमले का सामना किया, जिसमें मृत्यु व गंभीर चोट संभव है। 10 लाख में 20.91 लोगों ने कम प्रभाव वाले हमले का अनुभव किया।
हमले के मनोवैज्ञानिक प्रभाव का भी अध्ययन किया गया, जिसमें 50 प्रतिशत से अधिक उत्तरदाताओं ने अमूर्त प्रभावों के बारे में अनुभव बताए, जैसे कि डर लगना, चिंता, व्यवहार में बदलाव, जिसमें खेती करने या बच्चों को असुरक्षित रास्तों से स्कूल भेजने की अनिच्छा शामिल है। कुछ मामलों में तो परिवारों ने बार-बार तेंदुओं के हमले के कारण कृषि गतिविधियों को पूरी तरह छोड़ दिया।