
आठ मार्च यानी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर पत्रकार वर्षा सिंह बता रही हैं कि पर्यावरण पत्रकारिता और इसमें महिलाओं की हिस्सेदारी क्यों जरूरी है। संपादकीय टीम में नेतृत्व के पदों पर उनकी उपस्थिति क्यों अहम है और दूर-दराज के क्षेत्र से ग्राउंड रिपोर्ट कवर करने के दौरान क्या चुनौतियां हैं।
“बिना चाँदणी देखे, म्हारे तै नींद ना आवे, मैं पागल सी हो जाऊँ सूँ”
एक उम्रदराज हरियाणवी महिला के ये शब्द मुझे अपनी पर्यावरण आधारित पत्रकारिता की यात्रा के बेहद ख़ूबसूरत और चुनौतीपूर्ण अनुभवों में से एक लगते हैं। ये वाक्य प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते को भी दर्शाता है, जो अब कुछ अतीत का, भूला-बिसरा सा, जीवन लगता है।
यमुना नदी के किनारे हरियाणा के यमुनानगर जिले में, वर्ष 2022 में,रेत खनन से जुड़ी एक कहानी की पड़ताल करने गई थी। यहां यमुना नदी के एक लंबे हिस्से में अंधाधुंध रेत खनन हो रहा है। स्थानीय मीडिया से लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल तक रिपोर्टें और पीआईएल चल रही हैं। नियम और मानकों को परे रख खनन, या अवैध खनन, भी बेरोक-टोक चल रहा है।
मेरे संपादक ने मुझे इस रिपोर्टिंग के लिए सावधान रहने की सलाह दी थी। देश में रेत खनन पर रिपोर्टिंग करने, लिखने या कार्रवाई करने वाले बहुत से लोगों को इसकी कीमत जान देकर चुकानी पड़ी है।
मुझे नदियों से, पानी से, प्रकृति से प्रेम है और शायद इसीलिए पर्यावरण पत्रकारिता मुझे आकर्षित करती गई और एक समय के बाद मैं पूरी तरह इसी धारा में रमती चली गई।
मैं यमुनानगर के कनालसी गांव के कुछ मज़बूत एक्टिविस्ट के साथ थी। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि उनकी मौजूदगी में कोई हमें टोकेगा नहीं।
हमारे किस्से-कहानियों में यमुना का किनारा बेहद जीवंत और उल्लास के साथ आता है, यमुनानगर में डर और दहशत के बीच एक खतरनाक सन्नाटे के भीतर से गुज़र रहा था।
चारों तरफ रेत के पहाड़, नदी में रेत खनन के वाहन, नदी के किनारों पर पानी के प्रवाह को रोकने के लिए बनाए गए छोटे-छोटे कुंड, ये सब हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों पर आघात थे। इन किनारों पर स्थानीय लोगों की मौजूदगी नहीं थी। नावें नहीं थीं। नाविक और मछुआरे नहीं थे। नदी किनारे खेलने वाले बच्चे नहीं थे।
रेत-बजरी से लदे, धूल उड़ाते, बड़े-बड़े ट्रक थे। रेत खनन से जुड़े ठेकेदारों के लोग थे जो सभी आने-जाने वालों पर निगाह रख रहे थे। हमारे साथ-साथ चल रहे थे और फ़ोन पर हमारी आवाजाही और बातचीत की सूचना अपने बॉस से साझा कर रहे थे।

पर्यावरण पत्रकारिता से जुड़ी अपनी चुनौतियां और जोखिम भी हैं। हवा में इतनी रेत थी, बार-बार साफ करने के बावजूद मोबाइल की स्क्रीन पर धूल की परत चढ़ जा रही थी। नदी का प्रवाह, जलीय जीवों का जीवन, सांसों में उतरती हवा के साथ ये धूल, गांव के लोगों के साथ नदी का ये हश्र और उनके जीवन पर इसका असर, ये सब देखकर मैं गांव लौटी।
वह हरियाणवी अम्मा, चूल्हे की आंच पर, मिट्टी के बर्तन में खीर पका रही थीं। जनमाष्टमी से एक रोज़ पहले का दिन था। गांव के ज्यादातर घरों में बड़े और खुले आंगन थे। यहीं सोने के लिए चारपाइयां बिछी थीं। अम्मा बताती हैं कि बंद कमरे में सोने से उनकी सांसें घुटती हैं और हमेशा से ही तारों की छांव में, चांद को तकते हुए, उसकी चांदनी में सोने की आदत रही है।
इस समय 40, 50 या 60 की उम्र के शहरी लोग बता सकते हैं कि बचपन में कितने चमकीले तारे दिखते थे लेकिन अब नहीं दिखते। प्रदूषण हमारी स्मृतियों को भी ढंक रहा है।
मैं संतुष्टि का भाव लेकर इस रिपोर्टिंग से अपने शहर वापस लौटी। लेकिन जब भी ऐसी अनजानी यात्राएं शुरू होती हैं, आशंकाओं और सवालों के साथ होती हैं।
हम जिस कहानी पर काम करने जा रहे हैं, उसके किरदार कौन होंगे, क्या वे हमसे मिलेंगे, हमसे बातचीत को तैयार होंगे, हमारे सवालों के जवाब कैसे देंगे, ये एक बिलकुल अनजान लैंडस्केप में दाखिल होने जैसा होता है। पहले से खूब तैयारी करनी होती है। वहां के लोगों से बातचीत, उनका भरोसा पाना और इस भरोसे को बनाए रखना।
मैंने उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों से लेकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, बिहार, झारखंड समेत कई राज्यों में रिपोर्टिंग के लिए यात्राएं की हैं। एक समय में पर्यावरण पत्रकारिता, ज्यादातर पत्रकारिता संस्थानों में अलग से कोई बीट नहीं होती थी। जिस पर लगातार लिखा जा रहा हो। प्राकृतिक आपदाओं, तूफ़ान और भूकंप के दौरान ही ज्यादातर लिखा जा रहा था।
आज यदि पलट कर 20-30 साल पहले की ओर देखें, और उस समय भी पर्यावरण पत्रकारिता इतनी ही की जा रही होती जितनी आज, तो शायद हम आज के खतरों के बारे में ज्यादा बेहतर जानकारी रखते, और संभव है कि समय रहते कुछ कदम भी उठाये जा रहे होते।
एक वैज्ञानिक से बातचीत के मुताबिक बीते दशकों में हम पर्यावरण का इतना नुकसान कर चुके हैं कि इसका ख़ामियाजा आने वाले कुछ दशकों तक भुगतना होगा, चाहे हम आज सबकुछ सही कर लें, उन हालात में भी।
लेकिन आज भी हम भीषण नुकसान ही कर रहे हैं। हम और हमारा वायुमंडल एक विषम चक्र में फंस गया है कि खुद को ठंडा रखने के लिए हम वायुमंडल को और गर्म कर रहे हैं और हमारे पास बहुत अच्छे विकल्प भी नहीं हैं।
जलवायु वार्ताओं, जलवायु आपदाओं और जोखिमों के साथ-साथ पत्रकारिता की दुनिया भी बीते दो दशकों में तेजी से बदली है। आज मुख्य धारा से अलग पत्रकारिता की एक नई धारा बह रही है जिसमें प्रकृति आधारित पत्रकारिता करने वाले कई पत्रकार हैं। स्वतंत्र पत्रकार हैं। अर्थ जर्नलिज्म नेटवर्क समेत कई संस्थान इस पर केंद्रित प्रशिक्षण दे रहे हैं।
पर्यावरण पत्रकारिता में एक बड़ी संख्या महिला पत्रकारों की है। शायद ये प्रकृति से हमारे अपेक्षाकृत बेहतर गठजोड़ का नतीजा हो। इको-फेमेनिज़्म का एक मज़बूत उदाहरण आज पर्यावरणीय पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रही महिला पत्रकार हैं। जल-जंगल-ज़मीन से लेकर वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अक्षय ऊर्जा, जलवायु आधारित तकनीक और बिजनेस तक के मुद्दों पर रिपोर्ट कर रही हैं। खोजी पत्रकारिता कर रही हैं। अपने-अपने क्षेत्र की मज़बूत आवाज़ हैं।

हालांकि पत्रकारिता में महिलाओं की मौजूदगी बढ़ी है, लेकिन हमारी रिपोर्टों को पलटें तो इसमें विशेषज्ञ महिलाओं की अब भी कमी है। ज़मीनी आवाज़ के तौर पर तो महिलाएं खूब आती हैं। लेकिन शोधार्थी, वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, नीति निर्माता, शीर्ष पदों और नेतृत्व की हैसियत से बात कर रहीं विशेषज्ञ महिला किरदारों की हमें खूब जरूरत है। पत्रकारिता में ही मेरा ये सीखना भी हुआ कि एक पत्रकार के तौर पर हमें भी इन विशेषज्ञों को लगातार ढूंढ़ने और सामने लाने की जरूरत है।
इसके साथ ही पत्रकारिता संस्थानों में नेतृत्व वाले पदों पर भी महिला संपादकों की जरूरत है। यहां भी ज्यादातर पुरुष संपादकों का ही दबदबा है लेकिन हमारे पास श्रेष्ठ महिला संपादकों के बेहतरीन उदाहरण भी मौजूद हैं।
यह भी समझा जाना चाहिए कि करियर के लिए एक महिला की यात्रा एक पुरुष की यात्रा से बहुत अलग होती है। जब मैं एक हफ्ते के लिए अपने घर को छोड़ रिपोर्टिंग के लिए बाहर निकलती हूँ तो मेरे पीछे घर की ज़िम्मेदारियां, बच्चों की ज़िम्मेदारियां, सबकुछ मेरे लौटने का इंतज़ार कर रही होती हैं। इस लिहाज से मेरी कहानियां ज्यादा कीमती होती हैं।
पत्रकारिता समेत किसी भी क्षेत्र में उम्र के लिहाज से महिलाओं की मौजूदगी को देखना और इसका डाटा इकट्ठा करना भी वास्तविक स्थिति का अंदाज़ा लगाने में बेहतर होगा । इससे संस्थागत सपोर्ट देने की स्थिति भी स्पष्ट होगी।
महिला पत्रकारों के कई अनौपचारिक नेटवर्क, संस्थाएं, व्हाट्सएप ग्रुप, फेसबुक पेज़ भी हैं। जैसे नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया, इंडिया (एनडब्ल्यूएमआई)। एक नेटवर्क का हिस्सा होना, जरूरत पड़ने पर मदद मांगना और मदद करना, अपना स्थानीय नेटवर्क बनाना बेहतर है। एक अकेली योद्धा की जगह एक सपोर्ट सिस्टम में काम करना, सुरक्षा का अहसास देता है।
अपनी तमाम ज़िम्मेदारियों और बाधाओं के साथ भी, अपने लिए अवसर तलाशती, मज़बूत हौसले के साथ, देश और दुनिया की पत्रकारिता में महिलाएं शानदार काम कर रही हैं।
फोटो स्रोत: वर्षा सिंह।
(नोट: वर्षा सिंह दो दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और लंबे समय से पर्यावरण विषय पर देश के विभिन्न राज्यों से रिपोर्ट करती रही हैं। वर्षा सिंह को रिपोर्टिंग के लिए अनेकों राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप, ग्रांट और आवार्ड मिले हैं।)