फ्री होल्ड पर चाय बागानों की 30% जमीन उद्योगपतियों को देने का फैसला गलत : पीबीसीएमएस

कोलकाताः पश्मिच बंग चाय मजूर समिति(PBCMS) ने पश्चिम बंगाल सरकार के फ्री होल्ड पर चाय बागानों की जमीन उद्योगपतियों को देने का तीखा विरोध किया है और सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस को यह याद दिलाया है कि वह भूमि अधिकारों के बल पर ही राज्य में सत्ता में आ पायी थी और अब उसके द्वारा चाय मजदूरों के भूमि अधिकारों को नजरअंदाज करना उचित नहीं है। पश्चिम बंग चा मजूर समिति ने इस कोशिश को आदिवासी व नेपाली चाय बागान श्रमिकों को भूमि पर से उनके अधिकार से बेदखल करने का प्रयास बताया है।

हाल में पश्चिम बंगाल ग्लोबल बिजनेस सम्मिट 2025 में राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा इस आशय की घोषणा किये जाने का पश्चिम बंग चा मजूर समिति व उससे जुड़े श्रमिकं लगातार विरोध कर रहे हैं। पीबीसीएमएस ने अब इस पर एक विस्तृत बयान जारी कर अपना पक्ष रखा है। पीबीसीएमएस जो चाय मजदूरों के हितों के लिए काम करने वाला एक गैर राजनीतिक श्रमिक संगठन है, ने मुख्यमंत्री द्वारा हालिया नीति परिवर्तन की घोषणा किये जाने का कड़ा विरोध किया है, जिसके तहत चाय बागानों की अपनी अप्रयुक्त जमीन का 30 प्रतिशत तक पर्यटन व अन्य उद्योगों के लिए फ्री होल्ड आधार पर उपयोग करने की अनुमति देता है। सरकार का यह फैसला 15 प्रतिशत की पिछली सीमा को दोगुना कर देता है।

पीबीसीएमएस ने कहा है कि पूर्व में 15 प्रतिशत भूमि के रूपांतरण की अनुमति देते हुए भी उस पर नियंत्रण कायम रखा था, क्योंकि यह लीज पर था। अब सरकार नियंत्रण छोड़ कर फ्री होल्ड पर जमीन दे रही है। यह पहले से संघर्षरत चाय उद्योग व चाय श्रमिकों की आजीविका पर सीधा हमला है।

यह स्थानीय आदिवासी आबादी के साथ विश्वासघात है

पश्चिम बंग चा मजूर समिति ने कहा है कि ऐसा कदम उठाना स्थानीय आदिवासी आबादी के साध विश्वासघात है, जिन्हें पहले से ही उनके भूमि अधिकारों से वंचित रखा गया है। जो भूमि इस समुदाय के पास पीढियों से कब्जे में है, उस पर उन्हें अधिकार देने के बजाय सिर्फ पांच डिसमिल पट्टा पर देना एक एक प्रतीकात्मक पहल है। यह कदम चाय श्रमिकों की दीर्घाकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के बजाय चाय श्रमिकों को निरंतर अनिश्चितता व असुरक्षा में रखता है।

ऐसा कदम अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के स्वदेशी और जनजातीय जनसंख्या कन्वेंशन 1957 (सी 107) का उल्लंघन है, जिसे भारत ने अनुमोदित किया है। वास्तव में भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बाध्यकारी दायित्व के तहत है कि वह उस भूमि पर चाय बागानों की जनजातीय आबादी के भूमि अधिकारों को मान्यता दे, जिस पर उनका पारंपरिक रूप से कब्जा है।

ऐसी गंभीर स्थिति में पर्यटन व अन्य उद्योगों के लिए बड़े स्तर पर भूमि परिवर्तन को बढावा देने से न केवल चाय उद्योग में गिरावट आएगी, बल्कि बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, आर्थिक अस्थिरता बढेगी और हजारों श्रमिकों के परिवारों का विस्थापन होगा। चाय बागानों को पर्यटन उद्योग में बदलने से क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने में बाधा आएगी, जिससे चाय बागान श्रमिक जो पहले से ही दशकों के शोषण और सरकारी उदासीनता के शिकार है, और हाशिये पर चले जाएंगे।

सरकार तत्काल फैसला बदले और भूमि अधिकार दे

पीबीसीएमएस ने अपना विरोध दर्ज कराते हुए पश्चिम बंगाल सरकार से मांग की है कि इस नीति को तत्काल बदला जाए और चाय उद्योग के लिए हस्तक्षेप किया जाए। 30 प्रतिशत जमीन को फ्री होल्ड पर स्थानांतरित करने की नीति को तत्काल वापस लिया जाए, चाय श्रमिकों व आदिवासी समुदायों को स्थायी भूमि अधिकार, उन सभी भूमि पर दिया जाए, जिन पर उनका परंपरागत रूप से कब्जा रहा है। साथ ही चाय बागानों की अनुपयुक्त जमीन में चाय के पेड़ लगाने के लिए चाय बागान नियोक्ताओं को प्रोत्साहन देकर चाय बागान क्षेत्र में रोजगार में वृद्धि किया जाए।

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