सिमट रहे हैं चरागाह, मंडरा रहा है मवेशियों की दुनिया पर जलवायु संकट का खतराआज घास आधारित चराई प्रणाली पृथ्वी की लगभग एक तिहाई सतह पर फैली है। यह दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य उत्पादन प्रणालियों में से एक है। लेकिन, अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन इन चरागाहों के “सुरक्षित जलवायु दायरे” को सिकोड़ रहा है।
राजस्थान के किसी गांव की सुबह सोचिए, चरवाहा अपने मवेशियों को लेकर निकलता है। पर, घास पहले जितनी घनी नहीं है। हवा सूखी है और गर्मी कुछ ज्यादा लग रही है।
यह सिर्फ एक मौसम का उतार-चढ़ाव नहीं है।
नई वैज्ञानिक स्टडी कहती है कि अगर तापमान इसी तरह बढ़ता रहा तो इस सदी के अंत तक दुनिया के 36 से 50 प्रतिशत ऐसे इलाके, जो आज मवेशी चराने के लिए उपयुक्त हैं, अपनी उपयोगिता खो सकते हैं।
यह शोध जर्मनी के Potsdam Institute for Climate Impact Research यानी PIK के वैज्ञानिकों ने किया है और इसे प्रतिष्ठित जर्नल Proceedings of the National Academy of Sciences में प्रकाशित किया गया है।
आज घास आधारित चराई प्रणाली पृथ्वी की लगभग एक तिहाई सतह पर फैली है। यह दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य उत्पादन प्रणालियों में से एक है। लेकिन, अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन इन चरागाहों के “सुरक्षित जलवायु दायरे” को सिकोड़ रहा है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि मवेशी, भेड़ और बकरियों के लिए चराई का एक संतुलित दायरा होता है। तापमान माइनस 3 से 29 डिग्री सेल्सियस के बीच। सालाना वर्षा 50 से 2627 मिलीमीटर. आर्द्रता 39 से 67 प्रतिशत और हवा की रफ्तार 1 से 6 मीटर प्रति सेकंड।
जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो चराई मुश्किल हो जाती है।
अध्ययन के अनुसार अगर उत्सर्जन कम नहीं हुआ तो वर्ष 2100 तक 100 मिलियन से अधिक पशुपालकों और लगभग 1.6 अरब मवेशियों पर असर पड़ सकता है।
सबसे ज्यादा खतरा अफ्रीका में है। कम उत्सर्जन वाले परिदृश्य में भी वहां 16 प्रतिशत चरागाह क्षेत्र घट सकता है। अगर जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल बढ़ता रहा तो यह कमी 65 प्रतिशत तक जा सकती है। अफ्रीका के कई हिस्सों में तापमान पहले ही सुरक्षित सीमा के ऊपरी छोर पर है।
इथियोपियाई हाईलैंड्स, ईस्ट अफ्रीकन रिफ्ट वैली, कालाहारी बेसिन और कांगो बेसिन जैसे महत्वपूर्ण चराई क्षेत्र दक्षिण की ओर खिसक सकते हैं। लेकिन अफ्रीका की भौगोलिक सीमा दक्षिण में समुद्र तक समाप्त हो जाती है। यानी तापमान बेल्ट आगे बढ़ेगी, जमीन खत्म हो जाएगी।
शोधकर्ताओं का कहना है कि परंपरागत अनुकूलन उपाय, जैसे पशु प्रजाति बदलना या झुंड को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना, अब पर्याप्त नहीं होंगे। बदलाव बहुत बड़े और तेज़ हैं।
इसका असर सिर्फ दूध या मांस की कीमत पर नहीं पड़ेगा। यह आजीविका, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा मुद्दा है। खासकर उन देशों में जहां पहले से भूख, आर्थिक अस्थिरता और लैंगिक असमानता मौजूद है।
वैज्ञानिकों का निष्कर्ष साफ है। जीवाश्म ईंधन से तेजी से दूरी बनाना ही सबसे प्रभावी रणनीति है, ताकि पशुपालन पर आने वाले इन गंभीर प्रभावों को कम किया जा सके।
चरागाह सिर्फ घास का मैदान नहीं होता। वह एक जीवन पद्धति है। सदियों से चली आ रही परंपरा है।
अगर तापमान की रेखा ऐसे ही ऊपर जाती रही, तो कई समुदायों के लिए जमीन सिर्फ सूखती नहीं, खिसकती हुई दिखाई देगी।