संताल आदिवासियों के संगठनों का तर्क है कि जब वैश्विक डिजिटल प्लेटफॉर्म गूगल ने ओलचिकी लिपि को अपने ट्रांसलेशन में जोड़ लिया है तो हमारी राज्य सरकार इसकी स्वीकार्यर्ता बढाने व इस भाषा में पुस्तक तैयार करने व पठन-पाठन को क्यों तैयार नहीं है।
दुमका: दिसोम मरांग बुरु संताली अरीचली आर लेगचर अखड़ा और ग्रामीणों ने संताली भाषा, ओलचिकी लिपि और शिक्षा को लेकर दुमका प्रखंड के हिजला गांव में अखड़ा के सचिव व हिजला गांव के मंझी बाबा(प्रधान) सुनिलाल हांसदा के अध्यक्षता में 10 फरवरी 2025 को कुल्ही दुड़ूप(बैठक) किया। अखड़ा और ग्रामीणों का कहना है कि संताली भाषा सिर्फ और सिर्फ ओलचिकी लिपि से ही वैज्ञानिक रूप से सही से लिखा जा सकता है, क्योंकि ओलचिकी लिपि के जनक स्वयं पंडित रघुनाथ मुर्मू थे। पंडित मुर्मू स्वयं संताल आदिवासी समुदाय से आते थे। इसलिए इस लिपि के माध्यम से सभी संताली शब्दों को सटीक और वैज्ञानिक रूप से लिखा जाता है। इसके अलावा जितनी भी अन्य लिपि है, उनके जनक संताल आदिवासी नही हैं, जिस कारण उन लिपियों से संताली शब्दों को सटीक और वैज्ञानिक रूप से कभी भी नही लिखा जा सकता है। इसलिए ओलचिकी लिपि संताल आदिवासियों की स्वदेशी लिपि है और अन्य सभी लिपि उधार ली गई लिपियां हैं, जो अन्य भाषाओं के लिए विकसित हुई थी।. इसलिए संताल समुदाय के लिए ओलचिकी लिपि उनकी मूल और सांस्कृतिक रूप से प्रामाणिक और वैज्ञानिक लिपि है। अखड़ा और ग्रामीणों का आगे कहना है कि झारखंड राज्य का गठन मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों के सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास को ध्यान में रखते हुए किया गया था। झारखंड राज्य बनने के 25 वर्षों के बाद भी विभिन्न आदिवासी समुदायों का संपूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं हुआ है। संताल आदिवासी समुदाय झारखंड राज्य में आदिवासी वर्ग में सबसे अधिक संख्या में है।
सर्वाधिक जनसंख्या होने के बावजूद संताल समुदाय का संपूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं हो सका है। उसका मुख्य कारण संताल आदिवासियों को उनके मातृभाषा संताली और ओलचिकी लिपि में शिक्षा नही मिलना है। इनके शैक्षणिक स्तर और जीवन स्तर को सुधारने के लिय यह जरूरी है कि उनके ही मातृभाषा संताली और उसकी स्वयं की स्वदेशी लिपि ओलचिकी लिपि में ही सभी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाया जाए।
संताल समुदाय की सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहे और नई पीढ़ी अपनी ही भाषा, लिपि और परंपराओं से जुड़ी रहे, उसके लिए भी यह जरूरी है कि इनकी भाषा संताली और ओलचिकी लिपि को और बढ़ावा मिले।
संताली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्ष 2003 में ही शामिल किया गया है, फिर भी इसे वास्तविक रूप से बढ़ावा देने के लिए और प्रयासों की जरूरत है। अखड़ा और ग्रामीणों का कहना है कि संताली भाषा पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, बिहार जैसे राज्यों के साथ बांग्लादेश, नेपाल आदि देशो में भी बोला जाता है। पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम में राज्य सरकार द्वारा संताली भाषा के लिए केवल ओलचिकी लिपि को ही मान्यता प्राप्त है।
इन राज्यों में संताली भाषा की आधिकारिक लेखन प्रणाली के रूप में ओलचिकी का ही उपयोग किया जाता है और सरकारी दस्तावेज़, शिक्षा तथा प्रशासनिक कार्यों में इसे मान्यता दी गई है। एक लिपि ओलचिकी होने से अब संताली भाषा को विभिन्य क्षेत्रो में समझना और आसान हो गया है, क्योकि पहले संताली भाषा ओडिया, बांग्ला व असमी के लिए प्रयुक्त होने वाली लिपि के साथ देवनागरी लिपि से लिखा जाता थी। ओलचिकी लिपि पूरी दुनिया के संताल आदिवासी का एक पहचान बन गई है, जो इस हर क्षेत्र के इस समुदाय को लोगों को एकता के सूत्र में लाने का काम कर रहा है।
ओलचिकी लिपि से संताली भाषा को गूगल अनुवाद में जोड़ा गया है। इससे संताली भाषा और ओलचिकी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक नयी पहचान मिली है। झारखंड में कुछ लोग सस्ते राजनीतिक लाभ के लिए इसका विरोध कर सामाजिक समरसता को बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे सहन नहीं किया जाएगा। अखड़ा और ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन, दुमका के विधायक बसंत सोरेन से मांग की है कि संताल आदिवासी बहुल क्षेत्र में सभी शिक्षण संस्थानों में संताली भाषा और अन्य विषय उनकी मातृभाषा संताली और लिपि ओलचिकी लिपि में ही जल्द पढाई जाए। सरकारी विद्यालयों, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय में ओलचिकी शिक्षकों की नियुक्ति जल्द की जाए। और संताली भाषा की पाठ्य पुस्तकों का लेखन व प्रकाशन ओलचिकी लिपि में ही किया जाए। वक्ताओं ने कहा कि अगर सरकार द्वारा हमारी मांगों पर जल्द विचार नहीं किया जाता है तो मोड़े मांझी बैठक की जाएगी और अपनी भाषा व लिपि के संरक्षण व उसके अधिकारों के लिए आगे की रणनीति तय की जाएगी।
इस बैठक में तंबल हांसदा, देवी सोरेन, लाल हांसदा, रुबिलाल हांसदा, सुनील सोरेन, लखीराम हांसदा, दिलीप सोरेन, छोटू किस्कु, मनोज हेम्ब्रम, जीतनी हांसदा, निरुनी मरांडी, सुजाता सोरेन, खुली हांसदा, कुलीन सोरेन, प्रमीला किस्कू, सरला हांसदा, पहलू सोरेन, पकलू किस्कू, फुलमुनी मुर्मू, तेरेसा हेंब्रम, स्कूटी हांसदा, जयंती टुडू, अनूप हांसदा, अनुप्रिया टुडू, प्रियतम मुर्मू, प्रदीप सोरेन, एंथोनी किस्कू, दीपक मरांडी, सोमेल सोरेन ,छुटू किस्कू आदि उपस्थित थे।