नई दिल्लीः केंद्रीय बजट में इस साल भी मनरेगा का बजट पूर्ववत रखा गया है। नरेगा संघर्ष मोर्चा ने मनरेगा के आवंटन पर एक विश्लेषण प्रस्तुत किया है और कहा है कि पिछले वित्त वर्ष के समान ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट का बजट 86 हजार करोड़ पर स्थिर है और अगर मुद्रास्फीति से इसका समायोजन करें तो मनरेगा का बजट पिछले बटज से 4000 करोड़ कम होता है।
नरेगा संघर्ष मोर्चा ने कहा है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को केंद्रीय बजट में लगातार दरकिनार किया जा रहा है। यह सराकर का ग्रामीण मजदूरों के प्रति जानबूझ कर बेपरवाह व्यवहार को दर्शाता है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 86 हजार करोड़ रुपये पर स्थिर रखा गया है। जीडीपी के प्रतिशत के रूप में आवंटन पिछले वित्तीय वर्ष के 0.26 प्रतिशत से कम होकर 0.24 प्रतिशत रह गई है। वर्ष 2020-21 में यह जीडीपी का 0.56 प्रतिशत था।
नरेगा संघर्ष मोर्चा ने कहा है कि यह योजना नियमित वेतन सूचकांकीकरण मुद्रास्फीति के लिए समायोजन की भी प्रतीक्षा कर रही है और इस समायोजन को भी ध्यान में नहीं रखा गया है।
मोर्चा ने कहा है कि इस अपर्याप्त बजट के परिणामस्वरूप मजदूरी भुगतान में भारी देरी होगी, जिससे लाखों ग्रामीण मजदूर के लिए आर्थिक संकट बढेगा। काम की मांग का दमन होगा और लोगों को रोजगार के उनके अधिकार से वंचित रहना होगा। ढांचों के निर्माण की गुणवत्ता में कमी आएगी जिससे ग्रामीण बुनियादी ढांचा कमजोर होगा।

धनराशि समाप्त होने के बाद भी आवंटन नहीं
नरेगा संघर्ष मोर्चा ने कहा है कि वित्त वर्ष 2024-25 में धनराशि समाप्त होने के बाद भी कोई संशोधित आवंटन नहीं किया गया। एक फरवरी तक घाटा 9,860 करोड़ रुपये है, जिसमें 25 जनवरी तक 6948.55 करोड़ का लंबित वेतन या मजदूरी है। वित्तीय वर्ष दो महीने शेष रहने के साथ यह बारंबार होने वाली प्रवृत्ति – जहां बजट का औसतन 20 प्रतिशत पिछले बकाया को चुकाने के लिए उपयोग किया जाता है – का अर्थ है कि वित्त वर्ष 2025-26 के लिए प्रभावी आवंटन 70 हजार करोड़ से अधिक नहीं होगा। इस प्रवृत्ति का असर वर्ष 2024-25 पर पहले से ही दिखाई दे रहा है, जिसमें एक फरवरी 2025 तक 239.67 करोड़ व्यक्ति दिवस सृजित किये गए और प्रति परिवार औसत कार्यदिवस मात्र 44.62 रहा। जबकि 100 दिन का काम पूरा करने वाले परिवारों की संख्या मात्र 20,77,014 रही। मोर्चा ने कहा है कि इससे यह साफ दिखता है सरकार का मनरेगा के तहत अपने कानूनी दायित्वों को पूरा करने का कोई इरादा नहीं है।
नरेगा संघर्ष मोर्चा ने आरोप लगाया है कि केंद्र का कम आरंभिक आवंटन की रणनीति मनरेगा कार्य की मांग को दबाने का जानबूझकर किया गया प्रयास है। ऐसे समय में जब सरकार सुर्खियों में है – घटती खपत को संतुलित करने के लिए प्रत्यक्ष कर में राहत देकर मध्यम वर्ग को लुभाने के लिए, ऐसे समय में मनरेगा के लिए बड़ा बजट आवंटन ग्रामीण मांग को बहुत हद तक बढा सकता था। अपर्याप्त आवंटन के कारण मजदूरी भुगतान में भारी देरी होती है, जिससे मजदूर परेशानी में पड़ जाते हैं। कम मजदूरी दरों के साथ, यह उनकी भागीदारी को हतोत्साहित करती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि कार्यक्रम अपनी आधी क्षमता पर संचालित हो और 100 दिन के गारंटीयुक्त रोजगार की जगह 45 से 55 दिन का ही रोजगार मिले। यह सिर्फ बेपरवाही नहीं है, यह लाखों लोगों के लिए एक व्यवस्थित जीवन रेखा को व्यवस्थित तरीके से बिगाड़ना है।

संसदीय समिति की सिफारिशें दरकिनार
ग्रामीण विकास और पंचायती राज पर संसद की स्थायी समिति ने स्पष्ट रूप से मनरेगा के सुचारू कार्यान्वयन में धन की कमी को एक बड़ी बाधा के रूप में चिह्नित किया था। समय पर मजदूरी भुगतान, सामग्री लागत और समग्र प्रगति पर इसके प्रभाव पर जोर दिया था। समिति ने सिफारिश की थी कि ग्रामीण विकास मंत्रालय मनरेगा के प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए वित्त मंत्रालय से व्यावहारिक रूप से अधिक आवंटन की मांग करे। लेकिन, इन चेतावनियों को एक बार फिर से पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है।
दिसंबर 2024 में, नरेगा संघर्ष मोर्चा और उसके सहयोगी संगठनों के प्रतिनिधियों ने ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान को अपर्याप्त फंडिंग के भयानक परिणामों के बारे में जानकारी दी थी। उन्हें इस क्रम में यह बताया गया था कि यह कैसे इस योजना या कानून को कमजोर कर रहा है। ऐसे में यह बेहद निराशाजनक है कि इस परामर्श प्रक्रिया की भावना केंद्रीय बजट में पूरी तरह गायब है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन सहित मजदूरों की लगातार मांग के बावजूद सरकार की ओर से कोई कार्रवाई नहीं करना उन लाखों मजदूरों से धोखे से कम नहीं है, जो अपने जीवनयापन के लिए मनरेगा पर निर्भर हैं।