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राष्ट्रीय नदी घाटी मंच, कोशी नव निर्माण मंच और एनएपीएम की ओर से केंद्र सरकार के ताजा कदम के बाद इस परियोजना के खतरों के बिंदुवार उल्लेख किया गया है
कोशी-मेची नदी जोड़ परियोजना को कैबिनेट से मंजूरी कई खतरों और टकराव को न्योता देना है : एनएपीएम
नई दिल्ली/सुपौल (बिहार) : कोशी-मेची नदी जोड़ो परियोजना को केंद्रीय कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। केंद्र सरकार के इस कदम के बाद नदी घाटी मंच और नेशनल अलायंस ऑफ पिपुल मूवमेंट ने एक विस्तृत बयान जारी कर इस फैसले और आगामी खतरे पर अपना पक्ष रखा है। बयान में कहा गया है कि 28 मार्च 2025 को प्रेस इनफार्मेशन ब्युरो ने जानकारी दी कि केंद्रीय कैबिनेट ने कोशी-मेची नदी जोड़ परियोजना को मंजूरी दे दी है।
उल्लेखनीय है कि यह नई परियोजना केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना के बाद देश की दूसरी बड़ी नदी जोड़ परियोजना है। इस परियोजना के लाभ के रूप में कोशी की बाढ़ से राहत और सीमांचल के अररिया, पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार इत्यादि जिलों में सिंचाई को प्रचारित किया जा रहा है। पिछले वर्ष जब वित्त मंत्री ने इस परियोजना के लिए राशि आवंटित करने की घोषणा की थी, तब कोशी नवनिर्माण मंच ने नेशनल वाटर डेवलपेंट एजेंसी के वेबसाइट पर उपलब्ध इस परियोजना के विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) और क्षेत्र अध्ययन के आधार पर इसके दावे और हकीकत को खुलासा करते हुए इस पर सरकार से स्पष्टीकरण और श्वेत पत्र जारी करने की मांग की थी जिस पर कोई उत्तर आज तक नहीं आया है।
कोशी बाढ़ खत्म करने का खोखला दावा
परियोजना लागू होने पर भी कोशी के बाढ़ का पानी 1% भी नहीं कम होगा।
प्रचारित किया जा रहा है कि इस परियोजना के लागू होने से कोशी की बाढ़ कम या खत्म हो जाएगी। सच्चाई यह है DPR के अनुसार जब पूरी परियोजना कार्य करेगी तो कोशी पूर्वी मुख्य नहर से 20247 क्यूसेक पानी डायवर्ट होगा। इसके लिए पहले से 15000 क्यूसेक की क्षमता वाली कोशी पूर्वी नहर विद्यमान है जिसका रिमॉडलिंग करके 20247 क्यूसेक की क्षमता का बनाया। अर्थात मात्र 5247 क्यूसेक पानी इस नदी जोड़ परियोजना से अतिरिक्त डायवर्ट होगा।
2024 ने सितंबर में ही 6 लाख 81 हजार क्यूसेक से अधिक पानी कोशी नदी में आया था और भीम नगर बैराज की डिजाइन साढ़े 9 लाख क्यूसेक की क्षमता का बनाया गया है। मान लीजिए कि 2024 की बाढ़ के समय पूरी परियोजना कार्य करती रहती तो 1% से कम (0 .77%) पानी निकलता। इससे बाढ़ पर कोई फर्क नहीं पड़ता? विगत दिनों यह देखने को मिलता है कि जब पानी का बहाव ज्यादा होता है तो कोशी पूर्वी और कोशी पश्चिमी नदी के गेट बंद कर दिए जाते है। तो जब बाढ़ आएगी तो गेट बंद हो जाएगा तो यह पानी भी नहीं निकलेगा?
सिंचाई के दावों का हकीकत
यह सिंचाई परियोजना मात्र खरीफ की फसल के समय, अररिया, पूर्णिया, किशनगंज और कटिहार जिलों में 2 लाख 15 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में सिंचाई देगी। उस समय महानंदा बेसिन में 1640 मिमी वर्षा औसत 55 दिनों में पूरे क्षेत्र में होती है। इस प्रकार जब वहां पानी की वर्षा हो रही होगी तो सिंचाई देने जाएगी। रवि के फसल के समय पानी की जरूरत होती है। तो कहा गया है कि हाई डैम बनेगा तो सिंचाई दिया जाएगा। इस तरह एक सपना दिखा दिया गया है।
कोशी पूर्वी मुख्य नहर से उसकी शाखा नहरों के माध्यम से परियोजना बनते समय 7 लाख 12 हजार हेक्टेयर सिंचाई का लक्ष्य रखा गया था जब वह पूरा नहीं हुआ तो 1973 में उसका लक्ष्य में 3 लाख 38 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल घटा दिया गया। घटा हुआ लक्ष्य भी पूरा नहीं होता है। इसकी पुनरावृति इस परियोजना में भी होने की आशंका बनी रहेगी।
मान लजिए कि जब खरीफ के समय वर्षा नहीं हो रही हो तो सिंचाई की जरूरत कोशी पूर्वी नहर के कमांड एरिया में भी होगी और महानंदा बेसिन में इस नदी जोड़ से निकली नहरों में भी होगी। जब पुरानी सिंचाई परियोजना का घटाया गया लक्ष्य ही पूरा नहीं होगा तो नए क्षेत्र मे कैसे पूरा होगा? इससे पुराने कमांड एरिया और नए कमांड एरिया के किसानों के बीच हितों का टकराव बढ़ेगा।
कोशी नदी मेची जोड़ परियोजना से बाढ़ और जलजमाव बढ़ने का खतरा
यह परियोजना 13 हिमालय से आने वाली नदियों को सायफन के माध्यम से पार करेगी इसकी पूरी संरचना इन नदियों के लंबवत होगा, मानसून में ये नदियां भारी बेग में, फैलकर बाढ़ लेकर आती है साइफन और लंबवत संरचना के कारण इससे जल जमाव और बाढ़ का खतरा बढ़ जाएगा। (2017 में अररिया जिले के बथनाहा के समीप बने कोशी पूर्वी नहर जहां सायफन के माध्यम से नदी पार करती है वहां टूटा था।)
पर्यावरणीय प्रभाव
अन्य नदियों जोड़ परियोजना की भांति पर्यावरणीय व जैव विविधता पर इसका असर पड़ेगा। कोशी और महानंदा बेसिन की नदियों में पानी में सिल्ट की मात्रा अलग अलग होती है इसलिए इस पर भी प्रभाव पड़ेगा। यह एक मृगमरीचिका है।
कही पर निगाहे कहीं पर निशाना
ऐसा प्रतीत होता है कि इस परियोजना में किसानों, कोशी के बाढ़ पीड़ितों को बाढ़ मुक्ति का सपना दिखा कर चुनावी राजनैतिक लाभ, नेता- ठेकेदार के त्वरित लाभ के लिए एक नए विनाश की नींव डाली जा रही है।
हम लोग उपरोक्त उठाए गए सवालों पर केंद्र और राज्य सरकार से मांग करते है कि यदि उठाए गए सवाल गलत है तो हकीकत श्वेत पत्र जारी करते हुए, सच्चाई जनता के सामने लाएं। यदि सही है तो इस विनाशकारी परियोजना को रोका जाए। कोशी की बाढ़ कम करने और सिंचाई के वैकल्पिक प्रयाओं पर कार्य हो।
नदी घाटी मंच व जन आंदोलनो का राष्ट्रीय समन्वय (NAPM) के और से मेधा पाटकर, प्रफुल्ल समांतरा, राज कुमार सिन्हा, सी. आर. नीलकंडन, डॉ. सुनीलम, सौम्य दत्ता, हिमांशु ठक्कर, अरुंधती धुरु, सुनीति सु र, संजय मंगलगोपाल, आशीष रंजन, महेंद्र यादव, मीरा संघमित्रा व अन्य साथी – संगठन की ओर से यह बयान जारी किया गया है।
कोशी नवनिर्माण मंच के और से इंद्र नारायण सिंह, आलोक राय, राजेश मंडल व प्रियंका की ओर से यह बयान जारी किया गया है।