झारखंड में पत्रकारों व कम्युनिकेटर्स ने सामुदायिक व प्राकृतिक संसाधनों की रिपोर्टिंग पर की खुली चर्चा

कॉमन्स पर रिपोर्टिंग के लिए असर और कॉमन ग्राउंड ने आयोजित की कार्यशाला

इस कार्यशाला का आयोजन कॉमन्स संबंधी लेखन पर पत्रकारों की समझ को बेहतर बनाने और उनका नेटवर्क तैयार करने के लिए असर सोशल इम्पैक्ट एडवाइजर्स और कॉमन ग्राउंड की ओर से किया गया।

कार्यशाला में राज्य के विभिन्न हिस्सों से आए आदिवासी लेखक और इन्फ्लुएंसर्स सहित 90 से अधिक कम्युनिकेटर्स शामिल हुए, जिन्होंने अपना आइडिया शेयर किया और विशेषज्ञों व मीडिया आउटलेट के संचालकों व संपादकों ने अपना अनुभव साझा किया।

रांची: कॉमन्स यानी सामुदायिक संपदा संबंधी लेखन पर पत्रकारों की समझ को बेहतर बनाने और उनका नेटवर्क तैयार करने के लिए सोशल इम्पैक्ट एडवाइजर्स और कॉमन ग्राउंड की ओर से रांची के चाणक्य बीएनआर होटल में 27 एवं 28 फरवरी को दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित किया गया।

इस कार्यशाला में राज्य के विभिन्न जिलों से आए लगभग 90 पत्रकारों, कम्युनिकेटर्स, इन्फ्लुएंसर्स, लेखक व सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय लोगों ने भाग लिया। कार्यशाला में गुजरात, दिल्ली सहित कुछ अन्य राज्य के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। कार्यशाला में राज्य में कॉमन्स (सामुदायिक प्राकृतिक स्रोत) के महत्व के प्रचार-प्रसार में स्टोरी टेलिंग (कहानी सुनाना) की भूमिका पर चर्चा की गयी और यह समझ विकसित करने की कोशिश की गई कि सामुदायिक व प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षण और संवर्द्धन के लिए रिपोर्टिंग को कैसे फोकस किया जाए और उसमें कैसे गुणात्मक बलदाव लाया जाए, जिसका जमीन पर बेहतर असर दिखे।

मालूम हो कि आदिवासी बहुत व वन एवं प्राकृतिक संपदा से धनी राज्य झारखंड में 37 प्रतिशत भूभाग कॉमन्स की श्रेणी में आते हैं, जबकि देश में ऐसे भूभाग 20 प्रतिशत हैं। बीते सालों में सामुदायिक व प्राकृतिक संपदा का क्षरण व नुकसान अधिक तीव्र हुआ है, जिससे उस पर आश्रित लोगों की आजीविका प्रभावित हुई है। भारत में करीब 35 करोड़ लोग अपनी आजीविका के लिए कॉमन्स पर आश्रित हैं।

कार्यशाला में शामिल प्रतिभागी।

असर और कॉमन ग्राउंड की ओर से साझा डेटा के अनुसार, इस वर्कशॉप में झारखंड के सभी 24 जिलों के 45 ब्लॉक से आए कम्युनिकेटर्स ने हिस्सा लिया जो प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, वीडियो, न्यू मीडिया, सामुदायिक रेडियो और स्वतंत्र पत्रकारिता सहित अलग-अलग मीडिया पृष्ठभूमि से जुड़े हुए हैं। आदिवासी समुदाय के लेखकों और आदिवासी कला के चित्रकारों ने भी कार्यशाला में भाग लिया और उन्होंने पत्रकारों को जिला और राज्य दोनों स्तरों पर कॉमन्स पर आधारित दमदार और प्रभावशाली रिपोर्टिंग के बारे में अपने आइडिया को साझा किया। कार्यशाला में प्रतिभागियों के बीच झारखण्ड में कॉमन्स की भूमिका और जलवायु परिवर्तन, कृषि, भूमि उपयोग और पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर बनाने में कॉमन्स के संबंधों पर चर्चा की गई।

झारखंड की ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कार्यशाला के उदघाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहां, पर्यावरण संरक्षण केवल एक की जिम्मेदारी नही है, बल्कि यह भावी पीढ़ियों के लिए एक संकल्प है। सरकार नीतियों में कॉमन्स के संरक्षण को शामिल कर झारखंड को ज्यादा हरा-भरा और अधिक समृद्ध बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र महागामा में कॉमन्स के संरक्षण के लिए समुदाय की ओर से की गई दो पहल की चर्चा की। उन्होंने कहा कि असर सोशल इम्पैक्ट एडवाइजर्स और कॉमन ग्राउंड इनिशिएटिव के प्रयासों से इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रभावी रिपोर्टिंग होगी और जन जागरूकता बढ़ेगी। उन्होंने झारखंड के जल, जंगल और जमीन की रक्षा संबंधी सरकार की प्रतिबद्धता दो दोहराया।

अपने इलाके के स्टोरी आइडिया पर चर्चा करते प्रतिभागी।

झारखंड में वन विभाग के पीसीसीएफ व जैव विविधता बोर्ड के सदस्य सचिव संजीव कुमार ने उदघााटन सत्र को संबोधित करते हुए जैव विविधता संरक्षण और स्थायी आजीविका के बीच के संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने देशज इकोसिस्टम को संरक्षित करने और संरक्षण रणनीतियों में पारंपरिक ज्ञान को शामिल करने के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने यह सुनिश्चित करने पर भी ज़ोर दिया कि ग्रामीण समुदाय जैव विविधता संरक्षण प्रयासों से लाभान्वित हों।

झारखंड के वन विभाग के एडिशनल पीसीसीएफ रवि रंजन ने अपने संबोधन में आजीविका, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के अनुरूप बनने और बंजर भूमि एवं क्षरित भूमि के अहमियत की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने जोर देकर कहा, “इस प्रकार की भूमि पारिस्थितिकी को हरा-भरा बनाने और सामुदायिक संचालित संरक्षण प्रयासों में बहुत ज्यादा योगदान दे सकती है।

कार्यशाला में एक अच्छी बात यह रही कि राज्य के विभिन्न हिस्सों से आए पत्रकारों ने अपने क्षेत्र के मुद्दों को सामने लाया।

झारखंड की लेडी टॉर्जन कही जाने वाली चर्चित पर्यावरण कार्यकर्ता पद्मश्री चामी मुर्मू ने पर्यावरण कार्यकर्ता के रूप में अपने तीन दशक लंबे संघर्ष व यात्रा की चर्चा की और कहा कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया होता तो आज एक आम महिला की तरह घर में रह रही होतीं, इस मंच पर नहीं आती।

‘कॉमन्स के मुद्दों पर नीति निर्माताओं की भागीदारी’ नामक सत्र में बोलते हुए पूर्व आईएएस अधिकारी एनएन सिन्हा ने प्रभावशाली स्टोरी टेलिंग के लिए सरकारी संस्थानों के उपयोग संबंधी इनपुट दिए। दामोदर बचाओ अभियान के संयोजक गुलाब चंद ने भी कार्यशाला में अपने विचार साझा किए और उन्होंने नदियों के मानव जीवन में महत्व को रेखांकित किया।

कार्यशाला में वरिष्ठ पत्रकारों, संरक्षणवादियों और जमीनी स्तर के नेतृत्वकर्ताओं के साथ व्यापक चर्चा की गई, जिसमें कॉमन्स के महत्व और इससे जुड़े मुद्दों के प्रचार-प्रसार में मीडिया की भूमिका पर ध्यान केंद्रित किया गया।

कार्यशाला में चर्चा करते पत्रकार।

कार्यशाला में वरिष्ठ पत्रकारों और मीडिया आटटलेट के संचालकों व संपादकों ने अपने अनुभव साझा किए। वरिष्ठ पत्रकार हृदयेश जोशी ने पत्रकारों को कहा कि वे अधिक से अधिक कौशल संपन्न हों, इससे उनकी महत्व बढेगा व काम प्रभावी होगा। मोंगाबे इंडिया के सीनियर एडिटर कुंदन पांडेय ने कहा टकराव के बीच पत्रकारों को अपने काम के लिए रासता निकालना होगा। उन्होंने कहा कि अगर पत्रकार तथ्यों व पुख्ता डेटा के साथ मीडिया आटउलेट के पास अप्रोच करते हैं तो वे उनकी खबरों को खारिज नहीं कर सकते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अनुमेहा यादव ने कहा कि रिपोर्टिंग व स्टोरी टेलिंग के लिए पत्रकारों को दो लेयर पर काम करना होगा, एक शॉर्ट टर्म में जो स्टोरी वे कवर कर सकते हैं और दूसरा जिसमें कुछ महीने भी रिपोर्ट करने में लग सकते हैं, उन्होंने सूचना के लिए आटीआइ के प्रयोग की भी चर्चा की। पत्रकार सुनीता मुंडा ने वॉटर पार्क के लिए जल का दोहन करने की चर्चा करते हुए कहा कि मुख्य धारा के समाचार माध्यमों में हितों के टकराव है। उन्होंने कहा कि एक पत्रकार के रूप में जन मुद्दों को उठाना हमारा काम है। प्रभात खबर के पत्रकार मनोज सिंह ने कहा कि पत्रकारिता व एक्टिविजम में एक पतली रेखा है, जिसका पालन रिपोर्टरों को करना चाहिए। स्वतंत्र पत्रकार राहुल सिंह ने अपने जमीनी रिपोर्टिंग के अपने अनुभवों को साझा किया और कॉमन्स के संरक्षण में आदिवासी समुदाय व मछुआरा समुदाय की भूमिका की चर्चा की।

कार्यशाला में लैंड कनफ्लिक्ट वॉच के कुमार संभव ने रिपोर्टिंग करने के तरीके व किन बिंदुओं पर रिपोर्ट करना अधिक जरूरी है, इस विषय पर अपने प्रजेंटेशन के जरिए चर्चा की।


कार्यशाला का संचालन असर के मुन्ना झा, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार सुधीर पाल, सामाजिक कार्यकर्ता अमिताभ घोष, पत्रकार अंतरा बोस आदि ने किया। कार्यशाला में पंचायती राज व्यवस्था के प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपने अनुभव को साझा किया।

कार्यशाला में सुदूर इलाकों से रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों का अनुभव साझा करना काफी महत्वपूर्ण रहा।

कार्यशाला में कुछ चुनौतियों की भी पहचान की गई. जिनमें शामिल हैं, संचार के लैंगिक रूप से संवेदनशील तरीकों और जमीनी स्तर की ज्यादा-से-ज्यादा स्टोरीज की जरुरत जो कॉमन्स के प्रबंधन में महिलाओं की भूमिका को सामने लाती हों; कॉमन्स से जुड़े विषयों और जलवायु परिवर्तन, प्रबंधन और पर्यावरण स्थायित्व से उनके जुड़ाव संबंधी समझ को बेहतर बनाना; संरक्षण प्रयासों से संबंधी और अधिक पॉजिटिव स्टोरीज; इस मुद्दे पर रिपोर्टिंग करने और कॉमन्स के प्रबंधन संबंधी कानूनी ढांचे और कानूनों पर बेहतर समझ बनाने के लिए कम्यूनिकेटर्स को संस्थागत मदद उपलब्ध कराना।

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