पीबीसीएमएस ने कहा है कि पश्चिम बंगाल सरकार रैयतों से जबरन जमीन नहीं लेने की अपनी घोषित नीति से पीछे हट गई है और पुलिस बल लोगों को डरा रहा है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के देउचा मचामी में प्रस्तावित कोयला खनन का आदिवासी व स्थानीय समुदाय तीव्र विरोध कर रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के आठवें विश्व व्यापार शिखर सम्मेलन में इस प्रस्तावित कोल ब्लॉक से कोयला खनन शुरुआत का ऐलान किया था। सिंगूर और नंदीग्राम के भूमि आंदोलनों की बदौलत सत्ता में आयी तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख व राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का यह दूसरा ऐलान है, जिसे राज्य में व्यापक प्रतिरोध झेलना पड़ रहा है।
इससे पहले व्यापार शिखर सम्मेलन में चाय बागानों की 15 प्रतिशत की बजाय 30 प्रतिशत जमीन औद्योगिक घरानों को लीज पर देने के ऐलान का व्यापक प्रतिरोध शुरू हुआ और इसके बाद चिह्नित कोयला ब्लॉक से कोयला खनन का कार्य शुरू करने के फैसले को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल में मजदूरों व भूमि आंदोलन से जुड़े प्रमुख ट्रेड यूनियन पश्चिम बंग खेत मजूर समिति (PBKMS) ने राज्य सरकार के इस कदम पर आश्चर्य व्यक्त किया है और स्थानीय व आदिवासी समुदायों के विरोध प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कई मांगें रखी हैं।
पश्चिम बंग खेत मजूर समिति (PBKMS) ने मांग की है कि पुलिसिया कार्रवाई को रोका जाए और क्षेत्र से पुलिस बल का तुरंत हटाया जाए। क्षेत्र में इंटरनेट का कनेक्शन तुरंत बहाल किया जाए और बाहर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति दी जाए। लोगों की इच्छा के विरुद्ध भूमि के स्वरूप को जबरन बदलाव को रोका जाए और लोगों की जबरन सहमति हासिल करने को तत्काल रोका जाए।
पश्चिम बंग खेत मजूर समिति ने कहा है कि व्यापार शिखर सम्मेलन में मुख्यमंत्री ने घोषणा की थी कि दुनिया के दूसरे सबसे बड़े कोयला ब्लॉक उेउचा पचामी में छह फरवरी से काम शुरू होगा। सरकार के इस रवैये से ऐसा लगता है कि भूमि आंदोलनों की बदौलत सत्ता में आयी तृणमूल कांग्रेस ने लोगों से जबरन जमीन नहीं लेने के अपने घोषित नीति से पीछे हट गई है।

देउचा पचाली कोयला परियोजना के खिलाफ आंदोलन में बड़ी संख्या में महिला भी उतरी हैं। Photo Source – PBKMS
पहले यह प्रचारित किया जा रहा था कि मूल निवासी व आदिवासी इस परियोजना से खुश है और यह काम खाली सरकारी जमीन पर हो रहा है। लेकिन, चार मार्च 2025 को इलाके के लोगों के प्रतिरोध और उसके बाद पुलिस की कार्रवाई से यह स्पष्ट हो गया कि लोग इस परियोजना से बहुत नाराज थे। आदिवासियों ने चार मार्च को जमीन पर पर चरखे (लंबे डंडे) गाड़ दिए, जो एक आदिवासी परंपरा है जिसका मतलब है कि चरखे को हटाए जाने तक उस जमीन पर काम बंद कर दिया जाना चाहिए। इसके बाद वहां बेसाल्ट का खनन बंद हो गया, दरअसल उक्त स्थल पर कोयला तक पहुंचने से पहले बेसाल्ट की एक मोटी परत को हटाना होगा।
पश्चिम बंग खेत मजूर समिति ने यह भी कहा है कि फरवरी की शुरुआत में प्रशासन ने स्थानीय लोगों को बेवकूफ बनाते हुए रात के अंधेरे में काम करना शुरू दिया था। उन्होंने कहा कि कोई पेड़ नहीं काटा जाएगा और पेड़ों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया जाएगा। उन्होंने शुरुआत में ऐसा करना शुरू किया लेकिन लोगों को जल्द ही पता चला गया कि प्रशासन चंदा मौजा के सभी पेड़ों को बिना प्रत्यारोपण के काट रहा है। प्रशासन ने आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन के साथ संबंधों पर ध्यान नहीं दिया। पेड़ों की कटाई ने चिंगारी का काम किया और लोगों का विरोध शुरू हुआ। पश्चिम बंग खेत मजूर समिति ने कहा है कि स्थानीय लोग एकजुट हो रहे हैं और उन्होंने प्रलोभन व धमकियों दोनों के सामने सिर नहीं झुकाया है।
पश्चिम बंग मजूर समिति ने कहा है कि पुलिस जमीनी नेताओं को लगातार चरखा हटाने के लिए धमका रही है। समिति का आरोप है कि डिप्टी एसपी स्तर अधिकारी सहित पुलिसकर्मी ग्रामीणों को धमका रहे हैं। पांच मार्च को मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को इलाके में जाने से पुलिसकर्मियों एवं सत्ताधारी पार्टी के 200 लोगों ने रोक दिया। छह मार्च को इलाके में एक बड़ा पुलिस बल गया और उन्हें लगातार प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, यह वाकया सिंगूर और नंदीग्राम की याद दिलाता है।