देउचा पचामी पर पीबीकेएमएस की फैक्ट फाइंडिंग, 90 प्रतिशत लोग कोयला परियोजना के खिलाफ

पश्चिम बंगाल खेत मजूर समिति ने सवाल उठाया है कि जैसा कि सत्ताधारी दल के लोग प्रचार कर रहे हैं कि देउचा पचामी में कोयला परियोजना को स्थानीय लोगों की सहमति हासिल है तो फिर वहां भारी मात्रा में पुलिस क्यों है और नागरिक समूहों के प्रवेश पर रोक क्यों है?

कोलकाता: पश्चिम बंग खेत मजूर समिति (PBKMS) और उसके सहयोगी संगठन श्रमजीवी महिला समिति (SMS) ने 28 मार्च 2025 को प्रस्तावित देउचा पचामी कोल माइनिंग प्रोजेक्ट के मौजूदा हालात को लेकर एक अंतरिम फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट जारी कर पूरे इलाके का हालात बताया है। इन संगठनों की रिपोर्ट उस जमीनी अनुभव पर आधारित है जिसे इनके एक प्रतिनिधिमंडल ने 17 मार्च को क्षेत्र के दौरे के दौरान देखा और लोगों से बात कर अनुभव किया।

पीबीकेएमएस पहला ऐसा संगठन है जिसके कार्यकर्ता ग्राउंड जीरो पर जाकर जमीनी हालात का जायजा लेने में कामयाब हो सके, हालांकि इसके बाद कई दूसरे संगठनों को पुलिस की रोक व सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस समर्थकों के विरोध का सामना करना पड़ा।

पश्चिम बगाल के बीरभूम जिले में स्थित देउचा पचामी में विश्व का दूसरा बड़ा कोल माइनिंग प्रोजेक्ट शुरू होने वाला है और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा इस साल बंगाल ग्लोबल बिजनेस सम्मिट में इसको लेकर ऐलान किए जाने के बाद क्षेत्र में कामकाज की सक्रियता आने के बाद स्थानीय समुदाय ने उसका तीव्र विरोध किया।

17 मार्च को पीबीकेएमएस और श्रमजीवी महिला समिति के कार्यकर्ताओं व विशेषज्ञों के एक समूह ने उेउचा पचामी के जमीनी हालात का जायजा लिया था। पीबीकेएमएस व श्रमजीवी महिला समिति से स्थानीय युवाओं के एक समूह (जो वहां 13 ग्रामसभाओं में काम करता है) ने क्षेत्र का दौरा करने और जमीनी हालात का जायजा लेने का आग्रह किया था। समूह ने यह आग्रह तब किया जब उसे लगा कि स्थानीय लोगों के विरोध के बाद क्षेत्र में पुलिस की निगरानी बढने से वहां दमनकारी स्थिति पैदा हो रही है।

प्रतिनिधिमंडल में जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ काम करने वाली तीन महिला कार्यकर्ता, एक समाजशास्त्री, एक वकील और एक युवा पत्रकार शामिल थे।

पीबीकेएमएस ने अपनी फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में कहा है कि क्षेत्र में स्थिति पिछले एक साल से शांत थी, लेकिन मुख्यमंत्री द्वारा विश्व बांगला निवेश सम्मेलन में की गई घोषणा ने मामले को तूल दे दिया। इसके बाद चांदा मौजा प्रमुख रूप से आदिवासी आबादी है, वहां शुरू हुए कोयला प्रोजेक्ट के काम को लेकर ग्रामसभा की ओर से एक चरखा लगाया गया। चरखा लगाना एक आदिवासी परंपरा है जिसको लगाने का मतलब होता है कि जब तक उसे हटाया जा जाए काम रोक दिया जाए। इसका आयोजन 13 ग्रामसभाओं ने किया। हालांकि आसपास के ग्रामीणों की यह शिकायत थी भारी पुलिस बल का प्रयोग कर उन्हें इसमें शामिल होने से रोका गया। ग्रामसभा नेताओं के घरों की पुलिस द्वारा घेराबंदी की गई। अंतरिम रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने बेबुनियाद आरोप लगाए कि स्थानीय नेता माओवादियों से मिले हुए औंर हथियार को क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति दे रहे हैं।

क्षेत्र में इंटरनेट सेवा तीन दिन तक बाधिर रही। स्थानीय लोगों ने इंटरनेट सेवा को बहाल करने के लिए हाइकोर्ट के वकीलों की मदद ली, जिसके बाद यह बहाल हो सका। पीबीकेएमएस की अंतरिम रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय लोग बातचीत के दौरान क्षेत्र के एक डीएसपी को लेकर अधिक मुखर थे, जिन पर गामीणों ने धमकियां देने का आरोप लगाया। हाइकोर्ट के वकीलों की कुछ शिकायत के बाद उनके फोन कॉल बंद हुए। रिपोर्ट में स्थानीय आदिवासी नेताओं माझीहड़ाम को धमकाने का भी आरोप लगाया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि लोगों के बारे में सुनने को मिला जिन्हें आधी रात में उठाया गया और उन्हें स्थानीय होटल में ले जाया गया जहां उनका सामना एक जनप्रतिनिधि से हुआ।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सत्ताधारी दल के नेता यह प्रचार कर रहे हैं कि प्रस्तावित कोयला खदान से हर कोई खुश है और इससे नौकरियां की संभावनाएं बनेंगी और विकास होगा। ऐसे में स्थानीय लोगों का सवाल है कि जब सरकार ऐसा कर रही है लोगों की ‘सहमति’ भी है, तो गांवों में इतनी संख्या में पुलिस क्यों आती है। उनकी गाड़िया सात-आठ बार दिन में क्यों आती है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के एक समूह को टीएमसी समर्थकों ने रोक दिया और इलाके में घुसने नहीं दिया। विभिन्न ट्रेड यूनियनों की एक अन्य टीम को प्रवेश नहीं करने दिया गया। भोजन के अधिकार अभियान के कार्यकर्ताओं को भी रोका गया।

देउचा पचामी में विरोध प्रदर्शन के दौरान जुटे आदिवासी समुदाय की महिलाएं। फाइल फोटो। फोटो स्रोत: पीबीसीएमएस।

भारी पत्थर उत्खनन वाला इलाका


प्रतिनिधिमंडल की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में कहा गया है कि वह पूरा इलाका धूल के बादल से ढका हुआ था और उसका स्रोत पत्थर की खदानें और क्रशर मशीनें थीं। समय के साथ आदिवासी समुदाय का रिश्ता इन पत्थर खदानों से बदला है। 20 साल पहले आदिवासी मुख्य रूप से मजदूर थे और इन खदानों व क्रशर में शोषणकारी हालात में काम करते थे, जो मूलतः जमीन मालिक भी होते थे। फिर 2010-11 में एक स्थानीय आदिवासी संगठन ने इसके खिलाफ संघर्ष शुरू किया, हालांकि बाद में उसने अपना स्वतंत्र चरित्र खो दिया और वह टीमएसी नियंत्रित संगठन बन गया। 22 नवंबर 2022 को पश्चिम बगाल सरकार की एक गजट अधिसूचना ने हालात बदले, जिसके तहत आदिवास भू स्वामियों को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और संबंधित विभागों से अनुमति लेने के बाद अपनी जमीन से लघु खनिज निकालने की अनुमति है। इससे क्षेत्र में क्रशर की भरमार हो गई। वे अन्य व्यापारियों के साथ साझेदारी कर रहे हैं। अमीर निवेशक खदान चलाने के लिए जरूरी पूंजी और मशीनें मुहैया कराते हैं। उन्हें खदान व क्रशर से होने वाली आय का एक हिस्सा मुहैया कराया जाता है।

क्षेत्र में सिलिकोसिस और अन्य फेफड़ों की बीमारियां होती हैं। खदानों में डाइनामाइट का प्रयोग किया जाता है। खदानों के पत्थर लोगों के घरों पर अक्सर गिरा करते हैं, लेकिन लोग खदान मालिकों से नुकसान की भरपाई करवा लेते हैं। यहां खदान की वजह से हुए गड्ढे को लेकर भविष्य के जल भंडारण क्षेत्र के रूप में बताया जाता है।

कोयला खनन के विरोध में हैं लोग


पीबीकेएमएस ने अपनी फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट मे कहा है कि पत्थर खदानों व क्रशर को मिलने वाले समर्थन से उलट स्थानीय लोग कोयला खनन के विरोध में हैं। वे यह मानते हैं कि इससे विस्थापन होता है और उनकी जीवन शैली को यह नष्ट कर देगा। प्रति बीघा 13 रुपये की मुआवजा राशि को नाकाफी माना गया है, क्योंकि दूसरी जमीन महंगी होगी और प्रति परिवार एक नौकरी वह भी सामान्य श्रेणी की, विस्थापन से होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं हो सकेगी। फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट मे कहा गया है कि प्रतिनिधिमंडल ने जिन लोगों से मुलाकात की उनमें मात्र 10 प्रतिशत लोग ही वास्तव में कोयला खनन के समर्थन में हैं और ये वे लोग हैं जो पिछले 10-12 सालों में पत्थर उद्योग के कारण इस इलाके में आए और फिर यहीं बस गए। ये लोग गैर मजरुआ जमीन पर बसे हैं और उन्हें इसका पट्टा दिया गया है। सरकार अब इन पट्टों को वापस ले रही है और इन कुछ परिवारों को कोयला खनन समर्थक बता रही है, जबकि परियोजना का विरोध करने वाली 90 प्रतिशत आबादी को नजरअंदाज कर रही है।

देउचा पचामी के मुद्दे पर प्रेस कान्फ्रेंस करते पीबीकेएमएस व सहयोगी संगठनों के प्रतिनिधि।

पीबीसीएमएस व सहयोगी संगठन की मांगें

पीबीसीएमएस ने हालात के मद्देनजर सरकार से कुछ प्रमुख मांगें रखी हैं। पीबीसीएमएस व उसके सहयोगी संगठनों की मांग है कि ग्रामसभा की पूर्ण सहमति के बिना कोयला या बेसाल्ट के उठाव का काम नहीं होना चाहिए। जमीन को जबरन नहीं छीना जाना चाहिए। वैश्विक जलवायु परिवर्तन को देखते हुए जंगल की जमीन का औद्योगिक उद्देश्य से उपयोग पर्यावरण विरोधी निर्णय है। ऐसा नहीं करना चाहिए। पुलिसिया उत्पीड़न पूरी तरह बंद हो। धमकी देने, झूठे मुकदमे दर्ज करने की कार्रवाई, निगरानी, लोगों के आवागमन पर नियंत्रण बंद हो। ग्रामसभा की अनुमति के बिना पुलिस गांव में प्रवेश नहीं करे और विरोध करने वालों को माओवादी व बाहरी कहना स्वीकार्य नहीं है। सभी को देउचा पचामी के लोगों के पक्ष में खड़े होने का अधिकार है। किसी भी व्यक्ति कोयला परियोजना में शामिल नहीं होने का अधिकार है और एक साथ विरोध करने के अधिकार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता है।

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