जलवायु जोखिम झेलने वाले देश सौर ऊर्जा अपनाने में विकसित देशों से आगे : रिपोर्ट

रिपोर्ट बताती है कि 2024 में इन देशों ने 155 अरब डॉलर सिर्फ फॉसिल फ्यूल आयात पर खर्च किए। अगर तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है, तो यह बिल और 30 अरब डॉलर बढ़ सकता है। यानी फॉसिल फ्यूल सिर्फ पर्यावरण का नहीं, अर्थव्यवस्था का भी बोझ है। और, इसका असर सीधा लोगों पर पड़ता है।

दुनिया जब तेल की कीमतों और युद्ध के असर से जूझ रही है, उसी वक्त एक अलग कहानी भी ख़ामोशी से बन रही है। ये कहानी उन देशों की है, जिन्हें हम अक्सर “कमजोर” या “विकासशील” कह देते हैं, लेकिन जलवायु के मोर्चे पर वही देश अब रफ्तार तय कर रहे हैं।

एंबर की नई रिपोर्ट एक सीधी, लेकिन चौंकाने वाली बात सामने रखती है। दुनिया के सबसे ज्यादा जलवायु जोखिम झेल रहे देशों में से करीब आधे देश अब सोलर एनर्जी अपनाने में अमेरिका से आगे निकल चुके हैं।

यह रिपोर्ट ऐसे वक्त आई है जब पश्चिम एशिया में संघर्ष के चलते तेल की कीमतें फिर से उछल रही हैं। और इसका सबसे ज्यादा असर उन्हीं देशों पर पड़ता है, जो पहले से आर्थिक और ऊर्जा असुरक्षा से जूझ रहे हैं।

लेकिन इस बार कहानी सिर्फ “झटका” की नहीं है। कहानी “जवाब” की भी है।


क्लाइमेट वलनरेबल फोरम और V20 Finance Ministers जैसे 74 देशों के इस समूह में, जो करीब 1.7 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, एक बड़ा बदलाव दिख रहा है। आधे से ज्यादा देश अब पूरी अर्थव्यवस्था में बिजली के इस्तेमाल यानी इलेक्ट्रिफिकेशन में भी अमेरिका से आगे निकल चुके हैं।

इस बदलाव की असली वजह टेक्नोलॉजी नहीं, उसकी कीमत है।

पिछले एक दशक में सोलर, बैटरी और इलेक्ट्रिक टेक्नोलॉजी की लागत 30% से 95% तक गिर चुकी है। इसका मतलब साफ है, अब सोलर सिर्फ “ग्रीन विकल्प” नहीं रहा, बल्कि कई जगहों पर यह सबसे सस्ता विकल्प बन चुका है।

और जहां ग्रिड पहुंचाना मुश्किल है, वहां छोटे ऑफ-ग्रिड सोलर सिस्टम कई बार उससे बेहतर साबित हो रहे हैं।

एक सोलर पार्क का प्रतीकात्मक फोटो।

झारखंड के गिरिडीह में सीसीएल के एक पुराने कोयला खनन क्षेत्र में बना सोलर पॉर्क।
फोटो: राहुल सिंह/क्लाइमेट ईस्ट।


रिपोर्ट में एक और दिलचस्प ट्रेंड सामने आता है। कई देशों में सोलर की असली तस्वीर सरकारी आंकड़ों से भी आगे निकल चुकी है। 10 में से 8 देशों में 2017 के बाद सोलर इंपोर्ट्स, इंस्टॉल्ड कैपेसिटी के आंकड़ों से तीन गुना ज्यादा हैं। यानी जमीन पर एक “डिसेंट्रलाइज्ड एनर्जी रेवोल्यूशन” चल रही है, जो डेटा में पूरी तरह दिख भी नहीं रही।

अगर उदाहरण देखें, तो नामीबिया अपनी बिजली का 35% सोलर से बना रहा है, टोगो 18% पर है। नेपाल और श्रीलंका में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की हिस्सेदारी 70% और 64% तक पहुंच चुकी है।

यह सिर्फ टेक्नोलॉजी का ट्रांजिशन नहीं है। यह निर्भरता का ट्रांजिशन है। रिपोर्ट बताती है कि 2024 में इन देशों ने 155 अरब डॉलर सिर्फ फॉसिल फ्यूल आयात पर खर्च किए। अगर तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है, तो यह बिल और 30 अरब डॉलर बढ़ सकता है।

यानी फॉसिल फ्यूल सिर्फ पर्यावरण का नहीं, अर्थव्यवस्था का भी बोझ है। और इसका असर सीधा लोगों पर पड़ता है। इन देशों में आज भी करीब 50 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके पास बिजली नहीं है, और उतने ही लोग गैर भरोसेमंद (unreliable) सप्लाई से जूझते हैं।

ऐसे में सोलर और इलेक्ट्रिफिकेशन सिर्फ जलवायु का समाधान नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का भी हल बनते जा रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, अब पुराना सवाल, “विकास या क्लाइमेट?” धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।

एंबर के प्रिंसिपल डान वाल्टर कहते हैं, “एनर्जी की इकॉनॉमिक्स बदल चुकी है। सोलर और बैटरी की गिरती कीमतें न सिर्फ फॉसिल फ्यूल को पीछे छोड़ रही हैं, बल्कि उन करोड़ों लोगों को भी शामिल कर रही हैं जो अब तक एनर्जी सिस्टम से बाहर थे।”

वहीं CVF-V20 की मैनेजिंग डायरेक्टर सारा जेन अहमद का कहना है, “अब जलवायु और विकास के बीच पुराना समझौता खत्म हो चुका है। ये देश सीधे फॉसिल फ्यूल के रास्ते को छोड़कर आगे बढ़ रहे हैं।”

इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात यही है। जिन देशों को हम “पीछे” समझते थे, वही अब आगे का रास्ता दिखा रहे हैं।
और शायद जलवायु की सबसे बड़ी कहानी यही है, कि बदलाव हमेशा वहीं से आता है, जहां जरूरत सबसे ज्यादा होती है।

Leave a Reply