बोेकारो: बोकारो जिले में जंगल बचाने के अपने अभियान के लिए पहचाने जाने वाले जगदीश महतो का रविवार (02 March 2025) को 75 वर्ष की आयु में निधन हो गया। रविवार सुबह कसमार ब्लॉक के अपने पैतृक आवास हिसीम में उन्होंने अंतिम सांसं ली।
झारखंड सरकार ने वर्ष 2023 में जगदीश महतो को ट्री मैन की उपाधि देकर सम्मानित किया था। तत्कालीन राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन एवं विधानसभा अध्यक्ष रवींद्र नाथ महतो के हाथों उन्हें झारखंड ट्री मैन की उपाधि देकर सम्मानित किया गया था। इससे पहले 2017 में उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री के हाथों झारखंड सम्मान मिला था।
जगदीश महतो ने जंगल बचाने के लिए खुद की जान को भी दावं पर लगा दिया था। वे पिछले 40 सालों से जंगल बचाने के अभियान में जुटे थे। इस दौरान वे वन माफियाओं के हमले से भी वे कई बार बाल-बाल बचे, जबकि जंगल बचाने के लिए पत्नी के गहने और खेत भी उन्हें बेचना पड़ा। पर, उन्होंने वन रक्षा आंदोलन को जिंदा रखा।
कुल्हाड़ी के विरोध ने जगदीश को बनाया नायक
जंगल बचाने के अभियान का जगदीश महतो का कारवां धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया और कुछ ही दिनों में इनका जंगल बचाओ आंदोलन पूरे उत्तरी छोटानागपुर में फैल गया। इस दौरान इन्होंने करीब साढ़े चार सौ गांव मे ग्राम स्तरीय वन सुरक्षा समितियों का गठन कर सबको इस आंदोलन से जोड़ा। हज़ारों महिला-पुरुष जंगल को बचाने का संकल्प लेकर डटकर इनके साथ खड़े रहे।
1984 में वन सुरक्षा आंदोलन की शुरुआत, कुल्हाड़ी के खिलाफ गोलबंद हुए लोग
हिसीम के केदला पहाड़ पर वन सुरक्षा आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1984 में हुई थी। यह वह दौर था, जब हिसीम पहाड़ व उसकी तलहटी से वन तेजी से साफ हो रहे थे।इस पहाड़ पर मुख्य रूप से चार गांव बसे हुए हैं, जहां काफी बड़ा इलाका वन क्षेत्र है। लेकिन धीरे- धीरे वन तस्करों के कारण इस क्षेत्र में जंगल कटने लगे। जब एक बार कुल्हाड़ी चलने की शुरुआत हुई तो फिर वह थमने का नाम ही नही ले रहा था। कुछ स्थानीय ग्रामीणों के वन माफियाओं के साथ मिले होने के कारण यहां के जंगल पूरी तरह उजड़ चुके थे।
जगदीश महतो ने एक बार द टेलीग्राफ अखबार से बातचीत में कहा था, मैं और मेरी पत्नी माया पेड़ों के लिए बात करते हैं, सोचते हैं, सपने देखते हैं और जीते हैं। मुझे वह दिन याद है जब नक्सलियों ने मुझे अगवा कर लिया था और मुझे यह स्वीकार करने के लिए प्रताड़ित किया था कि मैं पुलिस का मुखबिर हूँ। लेकिन मैं उन्हें बताता रहा कि मैं कोई मुखबिर नहीं हूँ, मेरे जीवन का एकमात्र मिशन धरती माता को हरा-भरा बनाना है।
ग्रामीण कुल्हाड़ी के खिलाफ एकजुट होकर खड़े हुए
जंगल को कटते देख ग्रामीणों ने बैठक कर यह निर्णय लिया कि अगर पेड़ों की कटाई को रोका नहीं गया तो ग्रामीण पर्यावरण के गंभीर संकट झेलने को मजबूर होंगे। फिर सभी ग्रामीण जंगलों में चल रही कुल्हाड़ी के खिलाफ एकजुट हो खड़े हो गए। ग्रामीणों की पहली बैठक हिसीम गांव के मध्य विद्यालय परिसर में अक्टूबर 1984 में हुई थी। बैठक में कुल्हाडी आंदोलन के लिए एक समिति का गठन किया गया। हर हाल में वनों की सुरक्षा का निर्णय लिया गया। उस वक्त उस समिति का अध्यक्ष विष्णुचरण महतो को बनाया गया था, लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने आंदोलन की बागडोर जगदीश महतो को सौंप दी। हालांकि विष्णुचरण महतो भी आंदोलन से जुड़े रहे।
जगदीश महतो के प्रयास से आंदोलन का विस्तार
जगदीश महतो के हाथों में आंदोलन की बागडोर आते ही जंगल बचाओ अभियान ने गति पकड़ी ओर आसपास के कई गावों के ग्रामीण इस आंदोलन के साथ जुड़ गए। आंदोलन का विस्तार होता चला गया। ग्रामीणों के जुड़ते-जुड़ते इस आंदोलन में शामिल गांवों की संख्या 450 पार कर गई।
अब भी जिन्दा है कुल्हाड़ी आंदोलन
आज भी कुल्हाडी आंदोलन ज़िंदा है। जगदीश महतो ने पिछले तीन दशक से वन सुरक्षा आंदोलन के अध्यक्ष पद की जिम्मेवारी संभाल रखी थी। इसी आंदोलन का असर है कि आज हिसीम केदला और उसके आसपास के गांव में हरियाली लौटी आई है। पूरा इलाका अब जंगलों से भरा पड़ा है।
जगदीश महतो ने प्रारंभिक शिक्षा अपने मामा के घर रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड स्थित संग्रामपुर सरकारी प्राथमिक विद्यालय से हुई थी। उसके बाद माध्यमिक शिक्षा कसमार प्रखंड के हरनाद हाई स्कूल से उन्होंने प्राप्त की। उनकी दो पत्नियां थीं दोनों से संतान नहीं होने पर उन्होंने एक बच्ची लक्ष्मी कुमारी को गोद लिया और पेड़ों से नाता जोड़ लिया। उन्होंने हर वर्ष रक्षा बंधन के दिन पेड़ों को रक्षासूत्र बांध कर वन बचाने की परंपरा की भी शुरुआत की थी।
(यह खबर मुख्य रूप से बोकारो आजतक वेबसाइट पर प्रकाशित खबर के आधार पर तैयार की गई है। इसके अलावा कुछ अन्य खबरों व आलेख की भी मदद इसे तैयार करने में ली गई है।)