रिपोर्ताजः पाताल जैसे पातालकोट के गांव, सहमे बच्चे, मुश्किलों से जूझती महिलाएं और घंटों का सफर…

मध्यप्रदेश से स्वतंत्र पत्रकार सतीश मालवीय छिंदवाड़ा जिले के पातालकोट घाटी रिपोर्टिंग के लिए पहुंचे थे। इस दौरान वे दिलचस्प अनुभवों से गुजरे। एक रिपोर्टर का यह अनुभव आपको पातालकोट की सैर करा सकता है और आप भी उन अनुभवों को उनके शब्दों के माध्यम से थोड़ा अहसास कर सकते हैं।

सतीश मालवीय, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश 

हम एक रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट के लिए पातालकोट पहुंचे थे। जैसा नाम वैसी जगह। जैसे यह पाताल ही हो। पिछड़ा इलाका, विपरीत हालात और मुश्किल भरी जन व स्वास्थ्य सुविधाएं। हमारी यह यात्रा हमें एक दिलचस्प और दिल को छू लेने वाले अनुभव से लेकर गुजरी। इस यात्रा में मेरे सहयात्री थे, गेलडूब्बा गांव के स्थानीय साथी 21 वर्षीय युवा शिव कुमार। शिव कुमार खुद गोंड जनजाति वर्ग से आते हैं जो पहले एक एनजीओ में काम करते थे और अब अपने गांव में कॉमन सर्विस सेंटर का संचालन करते हैं।

पातालकोट भौगोलिक दृष्टिकोण से एक घाटी इलाका है जो मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में स्थित है। घोड़े के नाल के आकार की यह घाटी पहाड़ियों से घिरी है और 79 वर्ग किमी क्षेत्र में फैली है। यह क्षेत्र में भारिया, कोरकू व गोंड आदिवासियों व अन्य समुदायों का घर है। छिंदवाड़ा जिले में जहां करीब 39 प्रतिशत आदिवासी आबादी है, वहीं इस इलाके की 90 प्रतिशत जनसंख्या आदिवासी है।

सरकार यहां इको टूरिज्म को बढावा देने के लिए प्रयास कर रही है। इसका उद्देश्य वनों की कटाई व क्षरण को रोकना भी है। पातालकोट में पर्यटन के विकास ने बहुत से गांवों को सड़क और दूसरी सुविधाओं से जोड़ दिया है। फिर भी अभी पातालकोट के निचले इलाकों और घने जंगलों में कुछ गांव सड़क और बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।

कोडिया से घाना गांव का मार्ग जो घने जंगल से होकर गुजरता है। कोडिया व घाना दोनों एक ही राजस्व गांव का हिस्सा हैं, लेकिन दोनों के बीच दूरी करीब तीन किमी है।

इस इलाके में घाना कोडिया ऐसा ही गांव है। हम इस गांव में पहुंचे। इस गांव तक पहुंचने के लिए कोई सड़क या रास्ता नहीं है। इसलिए यहां दूरी किलोमीटर और मील में नहीं मापी जाती, बल्कि दूरी को समय में मापा जाता है। पक्की सड़क वाले आखिरी गांव गेलडुब्बा से झरने नुमा रास्ते से नीचे उतर कर तीन पहाड़, घने जंगल और कई तेज़ बहते बरसाती नाले पार कर हम इन गांवों तक पहुंचे थे। यह यात्रा करीब चार घंटे की थी, जिस दौरान हमें रास्ते में कई चढाव व ढलान का सामना करना पड़ा।  

रास्ते में हमें एक पहाड़ उतरने और अगला चढ़ने के बाद लगता था कि अब तो कोई गांव हमारे रास्ते में मिल ही जाएगा। पर नहीं, घना जंगल और घना होता जाता और वहां कोई गांव नजर नहीं आता। 

सितंबर के महीने में भी यहां कुहरा था। रास्ते में कोडिया गांव के तीन बच्चे जो आठवीं कक्षा की तिमाही परीक्षा देने निकले थे, हमें मिले। उन्होंने बताया कि वे परीक्षा के निर्धारित समय से तीन घंटे पहले ही घर से निकले हैं ताकि समय पर परीक्षा के लिए पहुंच सकें। इस घने जंगल में हम जैसे अजनबी को देखकर बच्चे हैरान थे और थोड़े डर भी रहे थे। हम उनसे बात करना चाहते थे, पर उनके चेहरे पर हिचक का भाव थे। फिर भी किसी तरह हमने उनसे संवाद की कोशिश की। बच्चों ने पूछने पर बताया, “हमें जंगल में डर नहीं लगता, यह हमारा रोज़ का रास्ता है, हमें तो बस बाहरी लोगों से डर लगता है”। 

बहरहाल, हम बच्चों से ज्यादा से ज्यादा बात करना चाहते थे, ताकि इलाके की समझ हो, उनकी जिंदगी और परिस्थितियों को जान सकें, पर बच्चे जल्दी में थे, क्योंकि उन्हें परीक्षा के लिए पहुंचना था। कुछ मिनटों में वे हमें तेज़ी से पहाड़ चढ़ते और घने पेड़ों के बीच ओझल होते दिखे। बच्चों का हम जैसे बाहरी व अनजान लोगों से डरने की वजहें थी। हमारे साथी ने बताया, “दरअसल कुछ साल पहले जंगल मे यह खबर फैली थी कि बाहर से आए मानव अंग तस्करी करने वाले लोग जंगल मे घूम रहे हैं जो बच्चों को उठा कर ले जाते हैं। बच्चे इसलिए हमसे डर रहे थे”।

ज्ञानसा भारती का घर और उनके परिवार के लोग। आशा कार्यकर्ता तारा भारती ज्ञानसा भारती की भाभी हैं, बायें से तीसरे नंबर पर। बायें से पांचवें नंबर पर उनकी पत्नी व कस्तूरिया भारती व उनके बगल में पीली साड़ी में मां।

अब पहाड़ उतरते-चढ़ते, बरसाती नालों और घने जंगल को पार करते हुए करीब ढाई घंटे का रास्ता तय कर हम कोडिया गांव पहुंच चुके थे।

कोडिया गांव भारिया आदिवासियों का गांव है। कच्चे सीलन भरे मकान, गांव की कच्ची पथरीली गलियां। लगता है, शायद ही कभी किसी सरकारी अफसर या राजनेता ने इस गांव में कदम रखा होगा।

कोड़िया मे हम सबसे पहले ज्ञानसा भारती के घर पहुंचे। उनके घर के सभी इस अजनबी पैदल यात्री को देख कर अचंभित थे। ज्ञानसा किसान और आदिवासी कार्यकर्ता हैं और भारिया आदिवासी वर्ग से आते हैं।

हमारे उनके घर पहुंचते ही ज्ञानसा भारती की पत्नी कस्तूरिया भारती अचानक आये मेहमानों के स्वागत के लिए एक प्लेट मे गुजिया लेकर आ गईं। शहरों मे आम तौर पर गुजिया का बाहरी परत मैदा का होता है और अंदर खोया, सूखे मेवे या रवा होता है पर यह गुजिया पुरी तरह आटे का बना था एकदम सादा। इतनी कठिन चढ़ाई-उतराई करने के बाद हमें ये गुजिया बहुत स्वादिष्ट लगे। गुजिया खाने के बाद हमें पीने के लिए जो पानी दिया गया वो जंगल मे बह रहे किसी बरसाती नाले या पोखर का था।

ज्ञानसा और कस्तूरिया का घर कच्चा है, जिसमें बारिश से सीलन आ गई थी। वे संयुक्त परिवार में रहते हैं, जिसमें 10 सदस्य हैं।

कस्तूरिया गुजिया खिलाते हुए कहती हैं, “यहाँ रहने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए भईया। यहाँ हर चीज़ की परेशानी है”। वे बताती हैं, जब वह गर्भवती थीं और बच्चे को जन्म देने वाली थीं तब कैसे उन्हें इस दुर्गम इलाके मे मुश्किल का सामना करना पड़ा।

कस्तूरिया बताती हैं, “मुझे बहुत दर्द हो रहा था। डॉक्टर को दिखाना बहुत जरूरी था। यहाँ सड़क नहीं है, इसलिए एम्बुलेंस या दूसरी कोई गाड़ी यहाँ नहीं आ पाती। मेरी बिगड़ती तबीयत देख घरवाले मुझे डोली मे उठा कर चार चार किलोमीटर दूर गेलडुब्बा तक ले गए फिर वहाँ से ऑटो से 25 किलोमीटर दूर तामिया ले गए”।

“वो मेरे लिए बहुत मुश्किल समय था, भगवान ही हमारा भरोसा थे, बहुत हिम्मतवाले लोग हैं यहाँ जो मुझे इतना मुश्किल रास्ता तय करके ले गए और मेरी जान उन्होंने बचा ली”।

कोडिया गांव का एक दृश्य जो उबड़-खाबड़ व पठारी भूमि पर है।

ज्ञानसा कहते हैं, “यहाँ सबसे बड़ी समस्या सड़क की है। विकास क्या होता है इस गांव के लोगों ने देखा नहीं, न उन्होंने आज तक किसी नेता, विधायक, सांसद, कलेक्टर या तहसीलदार का मुँह ही देखा, क्योंकि आज तक कोई यहां तक आया ही नहीं। चुनाव आता है तो गेलडुब्बा हमें बुलाया जाता है, तब हमें राजनैतिक दलों व उम्मीदवारों के चुनाव चिह्न का पता चलता है कि कौन उम्मीदवार किस चुनाव चिह्न पर है। वो सिर्फ एक दिन का काम होता है और ऐसे में हम कैसे पता करें कि कौन उम्मीदवार हमारे लिए काम करेगा। बारिश खत्म होने पर हर साल हम पहाड़ को खोद कर रास्ता बनाते हैं। हमें राशन लेने के लिए या अपनी फ़सल मंडी मे बेचने जाने के लिए भी सिर पर बोझा उठा कर तीन पहाड़ पार कर जाना होता है”।

यहां के गाँव के लोग सरकार के रुख से बड़े नाराज हैं। इसलिए उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव (वर्ष 2023) का बहिष्कार करने का निर्णय लिया। 

सरकार से ग्रामीणों की नाराजगी

कोडिया गाँव की आशा कार्यकर्ता तारा भारती के कंधों पर कोड़िया और घना गाँव की स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी है। तारा भारती भी भारिया आदिवासी वर्ग से आती हैं और इसी गांव से हैं। यहाँ कोई डॉक्टर नहीं आता, बीमार होने पर 3-4 घंटे की पैदल यात्रा के बाद गेला डुब्बा पहुंचो और फिर वहाँ से तामिया तहसील। ये गांव तामिया तहसील में ही आते हैं। गंभीर बीमार व्यक्ति और गर्भवती महिला के साथ तो बड़ी मुश्किल होती है। उन्हें खाट पर या डोली में उठा कर लोगों को ले जाना पड़ता है। तारा के मुताबिक प्रसव के दौरान ज्यादातर महिलाएं कमजोर होती हैं, इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से हम संस्थागत प्रसव को प्राथमिकता देते हैं, पर इस जंगल से मरीज़ को बाहर निकालना बहुत मुश्किल है। बारिश के समय तो और भी परेशानी होती है। उस समय बरसाती नाले उफान पर होते हैं। जंगली जानवरों का भी डर होता है। तीन-चार साल पहले घाना और कोडिया गांव में कई बच्चों की मौत डेंगू और मलेरिया से हो गई थी।

आशा कार्यकर्ता तारा भारती व उनके परिवार की एक अन्य युवती। तारा भारती अपने गांव के मरीजों का इलाज करवाने के लिए कड़ी मशक्कत करती हैं।

जंगली नालों व झरनों का पानी पीते हैं लोग

कई दुश्वारियों के बाबजूद भी इस गांव के बच्चों में पढ़ने की बड़ी ललक है। गांव के कई बच्चे अब स्नातक और परास्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं। गाँव की वृद्ध महिलाएं और पुरुष मुश्किल रास्ता तय करके गेलडुब्बा प्रौढ़ शिक्षा केंद्र पढ़ने जाते हैं।

कोडिया गांव के ग्रामीण एक नाले से गुजरते हुए। इस इलाके में घने जंगल की वजह से कुछ पहले ही ंअंधेरा जैसा लगने लगता है।

आजीविका के लिए वन पर समुदाय की निर्भरता

घाना गांव की तरफ जंगल में और नीचे उतरते हुए ऐसा लगता है कि हम मौजूदा वक्त से बहुत पीछे पहुंच गए हैं। यहां घास और फूस के झोपड़े में लोग अभी भी रह रहे हैं। लोग आज भी अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह वनों पर निर्भर हैं। घना में कुछ वर्ष पूर्व कई बच्चों की जान निमोनिया और मलेरिया से चली गई थी। समय पर इलाज न मिलने के कारण लालवती के 11 वर्ष के बेटे की मृत्यु भी ऐसे ही हो गई थी। लालवती भी वही समस्याएं बताती हैं जो कस्तूरिया ने बताई थीं। इस गांव के लोग रोजगार के लिए साल के आठ-नौ महीने पलायन करते हैं।

कोडिया से घना के रास्ते का एक दृश्य।

ज़ब हम इन दोनों गांव की सरपंच रामवती चलठिया से फ़ोन पर संपर्क करते हैं, तो पता चलता है कि रामवती को पता ही नहीं की वो सरपंच हैं। फोन पर ज़ब हम उनसे पूछते हैं  कि हमारी बात सरपंच जी से हो रही है तो वो कहती हैं, “सरपंच साहब तो खेत जोतने गए हैं”। दरअसल वो अपने पति हल्के राम को ही सरपंच मानती हैं। हल्के राम से बात करने पर वो बताते हैं कि पंचायत में रोड की समस्या को लेकर वे तहसीलदार से लेकर राज्यपाल तक ज्ञापन दे चुके हैं, पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई।

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