दक्षिण बंग मत्स्यजीवी फोरम की पहल पर गंगा नदी के अपस्ट्रीम में 500 किमी लंबी यात्रा का आयोजन किया गया है
जगह-जगह नदी के दोनों तटों पर रूककर स्थानीय समुदाय के साथ मीटिंग व संवाद भी किया जा रहा है
पश्चिम बंगाल में मछुआरा समुदाय के अधिकारों की रक्षा, जलमार्ग, बंदरगाह व पर्यटन के नाम पर नदियों के अतिक्रमण व नदियों के प्रदूषण को सचेत करने के उद्देश्य से दक्षिण बंग मत्स्यजीवी फोरम ने नाव से एक महीने लंबी गंगा यात्रा निकाली है। 26 नवंबर को पश्चिम बंगाल में स्थित फ्रेजरगंज से यह यात्रा शुरू हुई है और 23 दिसंबर को यह यात्रा फरक्का पहुंचेगी। इस यात्रा में मत्स्यजीवी समुदाय व संगठनों के करीब 40 प्रतिनिधि शामिल हैं। चार दिसंबर को यह यात्रा पश्चिम बंगाल में त्रिवेशी के पास पहुंची है, जबकि दो नवंबर को यह यात्रा कोलकाता के पास थी। यह यात्रा 500 किमी लंबी है और दक्षिण बंग मत्स्यजीवी फोरम ने नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, पत्रकारों, श्रमिकों और किसानों से इसमें सहभागिता की अपील की है।
इस यात्रा के संबंध में क्लाइमेट ईस्ट से बात करते हुए दक्षिण बंग मत्स्यजीवी फोरम के महासचिव मिलन दास ने बताया कि हम इस यात्रा के जरिये नदियों के प्रति लोगों को जागरूक करना चाहते हैं और मछुआरा समुदायों के मुद्दो को सरकार के सामने लाना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि यात्रा के क्रम में हम नदी के दोनों तटों पर स्थानीय समुदाय के साथ मीटिंग भी करते हैं। मिलन दास स्वयं इस यात्रा में शामिल हैं।

यात्रा के दौरान तारागंज में मछुआरा व स्थानीय समुदाय को संबोधित करते वक्ता।
यह यात्रा अबतक गंगा सागर, पातीबुनिया, राजनगर, त्याकर बाजार दुर्गापुर, नामखाना, लॉट 8, काकद्वीप फिशिंग हार्बर, कुलपी में नंबर एक, टेंगरा चार, हरहा, डायमंड हार्बर, थानाबेरा, कांटाखली,केंडयामारी, कुमारचक, रूपनारायणचक, बेगुनबेड़ा, एरियाखली, जियोनखली, गडियारा, तारागंज, पुकुरिया, गोडाखली, बाबूघाट से गुजरी है और वहां रुकी है।
पांच करोड़ मत्स्यजीवी, विकास परियोजनाओं से सिकुड़ रहा मछली पकड़ने का क्षेत्र
दक्षिण बंग मत्सयजीवी फोरम ने अपने एक प्रेस बयान में कहा है कि देश में करीब पांच करोड़ मछुआरा हैं, जो अपनी आजीविका नदी, समुद्र, झील, तालाबा आदि में मछली पकड़ने व मछली पालन के जरिये अर्जित करते हैं। यह पेशा देश में करीब 80 करोड़ लोगों को सबसे सस्ता और सबसे अच्छा प्रोटीन भी उपलब्ध करवाता है। इस रूप में मछुआरा समुदाय देश के लोगों की खाद्य व पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करता है। पर, इस समुदाय को समुद्र, नदी, जलाशयों व वेटलैंड्स से अंधाधुंध तरीके से बेदखल किया जा रहा है। ऐसे बंदरगाह विकास, मेगा पर्याटन केंद्र, जलमार्ग जैसी विकास परियोजनाओं के नाम पर किया जा रहा है। इससे मछली पकड़ने का क्षेत्र तेजी से सिकुड़ रहा है। बजरे और जहाज मछुआरों के जाल व नाव को क्षतिग्रस्त करते हैं। बड़े जहाजों से उत्पन्न होने वाली शॉक वेव व ध्वनियां मछली की पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर रही हैं। नदियों पर बनाये जाने वाले बैराज के कारण मछलियों की प्राकृतिक आवाजाही बाधित हो रही है। अनियिमित निर्माण के कारण नदियों व आर्द्रभूमियों की प्राकृतिक तल संचयन व्यवस्था नष्ट हो रही है।

स्थानीय समुदाय के साथ दक्षिण बंग मत्स्यजीवी फोरम के सदस्य।
नदियों का प्रदूषण एक बड़ी चिंता की वजह
सिंचाई, उद्योग व नगरपालिकाओं के के रसायन युक्त जल को नदियों व आर्द्रभूमि में छोड़ा जा रहा है। ट्रॉलर, मच्छरदानी, जहर, बिजली के झटके व विस्फोटकों से मछली पकड़ कर मछलियों के स्टॉक को लूटा जा रहा है। मछली पकड़ने वाला समुदाय इसके बिना नहीं रह सकता। छोटे मछुआरे जल निकाय के सबसे बड़े हित धारक व संरक्षक हैं। पर, उनके पास पानी पर कोई कानूनी अधिकार नहीं है। संगठन ने कहा है कि राष्ट्रीय जल नीति में मत्स्य संसाधन या मछली पकड़ने से हासिल होने वाली आजीविका व हमारे द्वारा जल निकायों की एक पारिस्थितिकी सेवा के रूप में उल्लेख भी नहीं है। सरकार प्राकृतिक जल निकायों व मत्स्य संसाधनों की रक्षा के लिए उपलब्ध वैधानिक उपायों को लागू करने के लिए भी सक्रिय नहीं है।
पट्टे पर या केज में मछली पालन हितकर नहीं
दूसरी ओर, जलाशयों, आर्द्रभूमि, झीलों को उच्च किराए या पट्टे पर देकर या केज संस्कृति शुरू करके जल निकायों में मछली पकड़ने वाले समुदायों के स्वतंत्र पारंपरिक अधिकार को छीन लिया जा रहा है। निजी स्वामित्व वाले टैंकों और तालाबों में छोटे पैमाने के मछली किसानों को समझौते में अनियमितताओं, किराए के निर्धारण और वृद्धि और समझौते की समाप्ति के बाद पट्टे को जारी रखने की कोई गारंटी नहीं है। यह मछुआरा समुदाय के हित में नहीं है।

दक्षिण 24 परगना जिले में मछुआरा समुदाय के साथ चर्चा।
दक्षिण बंग मत्स्यजीवी फोरम की प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं –
मछली पकड़ने वाले समुदायों के जल अधिकार और सामूहिक स्वामित्व को सुनिश्चित करने के लिए विशिष्ट कानून बनाया जाए।
जल निकायों से अतिक्रमण, प्रदूषण और पानी के अत्यधिक मोड़ को रोका जाए।
गाद से भरी नदियों को पुनर्जीवित किया जाए।
मछली पकड़ने से संबंधित सभी फीश लैंडिंग सेंटर और सामूहिक कार्यों के क्षेत्रों में सामूहिक भूमि अधिकार प्रदान करें।
ट्रॉलिंग, मच्छरदानी, जहर, बिजली के झटके जैसी विनाशकारी मछली पकड़ने की विधियों को रोकें।
मच्छरदानी का उपयोग करने वाले मछुआरों का पता लगाएं और उन्हें टिकाऊ पद्धति अपनाने के लिए प्रेरित करने हेतु सब्सिडी के साथ मदद किया जाए।
अत्यधिक खतरनाक नालीदार शीट को बदलने के लिए सब्सिडी दर पर एफआरपी डोंगियां प्रदान करें।

उत्तर 24 परगना जिले में मछुआरों के साथ संवाद।
सार्वजनिक जल निकायों की नीलामी बंद करें और छोटे पैमाने के मछुआरों को उपयोगकर्ता अधिकार पट्टा प्रदान करें।
निजी जल निकायों पर छोटे पैमाने के मछली किसानों को पट्टे की सुरक्षा प्रदान करने के लिए कानूनी प्रावधान करें।
मछली बाजारों का आधुनिकीकरण करें और विकसित मछली विपणन प्रणाली शुरू करें।
मछली पकड़ने पर प्रतिबंध या कम क्षमता वाले समय में अंतर्देशीय मछली श्रमिकों को पांच हजार रुपये प्रति माह सहायता दी जाए।
समुद्री और अंतर्देशीय क्षेत्रों में संचालित सभी छोटी मछली पकड़ने वाली नौकाओं 30 एचपी क्षमता तक का तुरंत पंजीकृत किया जाए।
मछुआरों के जीवन और आजीविका को नुकसान पहुँचाने वाले जहाज़ों की गंगा नदी में आवाजाही पर रोक लगाई जाए।