पशुओं के ससोहराय पर्व में पशुओं की पूजा की जाती है, उन्हें आराम करने का मौका दिया जाता है और नाच-गान किया जाता है।
यह पर्व पशुओं के प्रति सम्मान को दर्शाता है, जिनके माध्यम से कृषि आधारित सभ्यता का विकास हो सका।
आदिवासी समाज का परंपरागत ज्ञान, मान्यताएं व पद्धतियां पर्यावरण से जुड़ी कई चुनौतियों से निबटने में बहुत कारगर हैं। उनकी मान्यताएं, धार्मिक पद्धतियां पर्यावरण व जैव विविधता के संरक्षण का संदेश देती हैं। संताल आदिवासियों का इस समय पांच दिनों का सोहराई पर्व चल रहा है। ऐसे में हमने इस विषय पर पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के निवासी व संताली धर्मगुरु व ग्रंथों के लेखक सोमाई किस्कू से इस संबंध में बात की। सोमाई किस्कू साहित्य के लिए टैगोर अवार्ड से सम्मानित लेखक हैं। उन्होंने संताली धर्मग्रंथ भी लिखा है।
उनसे हुई बातचीत का प्रमुख अंश इस प्रकार है-
संताल जातियों का जितना पर्व है, सब सृष्टि, प्रकृति, सामाजिक ढांचे और संस्कृति पर आधारित है। संताल जातियों का एक धर्मग्रंथ जमशिन विनती है। पहले यह श्रुति में था, अब यह पुस्तक के रूप में है। इस धर्मग्रंथ में सृष्टि को लेकर पूरी बात है। सृष्टि बनाने वाले को ठाकुर जी कहा जाता है।
सोहराय पर्व मूल रूप से गाय, बैल, भैंस जैसे पशुओं के सम्मान व मनुष्य के जीवन में उनके महत्व को रेखांकित करने वाला पर्व है। मरांग बुरु व लिटा गोडेत संतालों के देवता का रचना भी ठाकुर जी ने की थी। हम आदमी लोग ठाकुर जी की सीधे पूजा नहीं कर सकते हैं। सृष्टि बनाने वाले ठाकुर जी की पूजा मरांग बुरु व अन्य देवताओं के माध्यम से की जाती है, क्योंकि वे देवताओं के भी देवता व सुप्रीम पॉवर हैं।

धार्मिक अनुष्ठान का दृश्य।
सृष्टि के शुरुआत में ठाकुर जी ने मरांग बुरु को कहा कि धरती पर आदमी को तुम बोलो कि वे गाय-भैंस जैसे पशुओं के साथ देवाताओं की तरह व्यहार करें और इनके साथ चास (खेती) करे, इसके दूध को ठाकुर जी को देने के बाद उसे प्रसाद की तरह पिये।
मरांग बुरु ने आदमी को इन पशुओं के साथ चास यानी खेती करने के लिए कहा, लेकिन धरती पर आदमी की संख्या बहुत बढ गई तो उन्होंने इस पशुओं के साथ निभाये जाने वाले व्यवहार की शर्ताें का उल्लंघन किया। गाय को देवता की तरह नहीं समझने लगे, उनके साथ मारपीट करने लगे। तो सारे पशु ठाकुर जी के पास गये। उन्होंने ठाकुर जी को कहा, देखिये प्रभु जी आपने हमें धरती पर आदमी के साथ रहने के लिए भेजा था, लेकिन उनलोगों ने हमें बहुत पीड़ा पहुंचायी, काफी मारा, और खाना-पीना नहीं दिया, गाड़ी में जोता, हमं शारीरिक रूप से वह सब करने में सक्षम नहीं थे, फिर में हमसे करवाया, मारपीट कर शरीर का चमड़ा निकाल दिया। पशुओं ने अपने जख्म भी ठाकुर जी को दिखाया।
त्ब ठाकुर जी ने कहा, आप सहनशील हैं, इतना बर्दाश्त किया, हम आपको अब धरती पर नहीं रखेंगे अपने पास बुला लेंगे। यह बात ठाकुर जी की पत्नी ठकुराइन जी ने सुनी। उन्होंने ठाकुर जी से कहा, हे प्रभु, आप इनको ऊपर मत बुलाइए, इसस मनुष्यों को बहुत दिक्कत हो जाएगी, वे हमारी संतान हैं और ऐसे में मर जाएंगे, वह गोरू (पशु) के बिना कैसे रह सकते हैं। मैं इसको लेकर मरांग बुरु से बात करती हूं, मैं देखती हूं क्या कर सकती हूं।

धार्मिक अनुष्ठान का दृश्य।
सेहराय संताली कैलेंडर के हिसाब से एक महीना है और इसी महीने में पूजा होती है। माघ से संताली महीना शुरू होता है। सोहराय महीना दसवां महीना है। यह बांग्ला या विक्रम संवत में कार्तिक महीना है।
ठकुराइन माता ने मरांग बुरु का कहा कि आप अमावस्या में पशुशाला में पूजा कराइए, पशुओं की पूजा कीजिए। पूरे गांव को उसमें शामिल करवाइए और सभी से ऐसा करवाइए। इसी उपलक्ष्य को संताल सोहराय मनाते हैं। यह पांच दिनों का त्योहार है जो सोहराय महीने में जिसे अमावस्या से शुरू होता है। पांच दिनों की पूजा की अलग-अलग प्रक्रिया है।

संताल युवतियां सोहराई के दौरान दीप जलाते हुए।
अमावस्था में गौ पूजा होती है, दूसरे दिन उन्हें आराम करने का मौका दिया जाता है, तीसरे दिन बांधना पर्व होता है। चौथे और पांचवे दिन भी अलग-अलग उत्सव होते हैं। यह दृश्य ठकुराइन जी ने ठाकुर जी को दिखाया और कहा कि हमारी संतान गाय की कितनी सेवा कर रही है। यहीं से कृषि व मानव सभ्यता का विकास हुआ।

झारखंड में यह पर्व पौष मास में मनाया जाता है। ऐसा क्यों हुआ? जबकि यह पर्व अक्टूबर-नवंबर के महीने में होता है। दरअसल 1855 में 30 जून को सिदो मुर्मू कान्हू मुर्मू की अगुवाई में हूल शुरू हुआ था और यह कई महीनों तक चला, तब हूल के बाद सोहराय के महीने में लोग अपना घर छोड़ कर जंगल में छिपे हुए थे, बाद में वे जब बाहर आये तो उन्हें लगा कि हमारा साल गुजर रहा है, हम सोहराय नहीं मना सके और अपने पशुओं की पूजा नहीं कर सके। तब लोगों के दिमाग में यह बात आई की पौष के महीने में इसे मनाया जाये। तब से संताल परगना में यह पर्व पौष माह में मनाया जाता है, लेकिन अन्य दूसरी जगह जहां संताल हैं, वहां यह पर्व सोहराय महीने में ही अमावस्या के दिन से मनाया जाता है।