जलवायु का कुछ नुकसान अब टलना मुश्किल, पर इसका दायरा हमारे फैसलों पर करेगा निर्भर

एक नई रिपोर्ट के अनुसार, आज का उत्सर्जन सिर्फ आज के तापमान को नहीं बढ़ाता। उसका असर आने वाले दशकों तक बना रहता है। समुद्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। दुनिया के महासागर लगातार रिकॉर्ड मात्रा में गर्मी सोख रहे हैं। समुद्र की गहराई तक यह गर्मी पहुंचने में दशकों लगते हैं। इसलिए आज उत्सर्जित की गई ग्रीनहाउस गैसें भविष्य में भी समुद्र के गर्म होने और समुद्र का स्तर बढ़ने का कारण बन सकती हैं।

जलवायु बदलाव का असर आने वाले कई दशकों तक बना रहेगा, क्योंकि दुनिया पहले ही इतना ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कर चुकी है कि तापमान बढ़ने, समुद्र के स्तर में इजाफे और दूसरे लंबे समय के बदलावों का एक हिस्सा अब तय हो चुका है। लेकिन जलवायु विज्ञान की नई रिपोर्ट कहती है कि कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अभी भी तेज उत्सर्जन कटौती से भविष्य में होने वाले नुकसान को काफी हद तक सीमित किया जा सकता है।

10 New Insights in Climate Science 2026/2027 नाम की इस रिपोर्ट में दुनिया भर के 70 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने जलवायु विज्ञान से जुड़े 10 ऐसे बदलाव और निष्कर्ष सामने रखे हैं, जो आने वाले वर्षों में नीति और फैसलों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। रिपोर्ट को Future Earth, The Earth League और World Climate Research Programme ने मिलकर तैयार किया है। इसमें करीब 30 देशों के वैज्ञानिक शामिल हैं।

रिपोर्ट का एक बड़ा संदेश यह है कि आज का उत्सर्जन सिर्फ आज के तापमान को नहीं बढ़ाता। उसका असर आने वाले दशकों तक बना रहता है। समुद्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। दुनिया के महासागर लगातार रिकॉर्ड मात्रा में गर्मी सोख रहे हैं। समुद्र की गहराई तक यह गर्मी पहुंचने में दशकों लगते हैं। इसलिए आज उत्सर्जित की गई ग्रीनहाउस गैसें भविष्य में भी समुद्र के गर्म होने और समुद्र का स्तर बढ़ने का कारण बन सकती हैं।

Future Earth की Global Hub Director और रिपोर्ट के संपादकीय बोर्ड की सदस्य वेंडी ब्रॉडगेट के मुताबिक, समुद्र ने अब तक पृथ्वी के लिए एक तरह के ‘shock absorber’ की भूमिका निभाई है। लेकिन आज का उत्सर्जन आने वाले वर्षों में भी गर्मी और समुद्र के बढ़ते स्तर के रूप में सामने आएगा।

समुद्र का बढ़ता स्तर कितना बढ़ेगा, यह अभी तय नहीं


ग्लेशियरों और बर्फ की बड़ी चादरों के पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। इसका कुछ हिस्सा अब वापस नहीं लौटेगा। लेकिन समुद्र आखिर कितना ऊपर जाएगा, यह अभी भी इंसानी फैसलों पर निर्भर है। यानी समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी को पूरी तरह रोकना संभव नहीं हो सकता, लेकिन उसे कितना बढ़ने दिया जाएगा, इसमें उत्सर्जन कटौती की बड़ी भूमिका होगी। यही बात 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पर भी लागू होती है।

Potsdam Institute for Climate Impact Research के निदेशक जोहान रॉकस्ट्रॉम के मुताबिक, 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने पर जलवायु के ऐसे असर का खतरा तेजी से बढ़ता है, जिन्हें वापस पलटना मुश्किल या असंभव हो सकता है। तापमान में हर अतिरिक्त 0.1 डिग्री की बढ़ोतरी इन जोखिमों को और बढ़ाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जितने लंबे समय तक रहेगा, नुकसान का खतरा उतना बढ़ेगा। ऐसी स्थिति में उत्सर्जन कम करने के साथ कार्बन हटाने और जलवायु अनुकूलन की जरूरत भी बढ़ेगी।

पानी की कमी सिर्फ सूखे इलाकों की कहानी नहीं


जलवायु बदलाव और इंसानों की बढ़ती पानी की जरूरत के बीच दुनिया के कई हिस्सों में महाद्वीपीय स्तर पर मीठे पानी की कमी तेजी से बढ़ रही है। इसका सीधा असर खेती और खाद्य उत्पादन पर पड़ सकता है। नदियों और दूसरे freshwater ecosystems पर भी दबाव बढ़ेगा। यानी जलवायु संकट की कहानी सिर्फ बढ़ते तापमान या बाढ़ और गर्मी की घटनाओं तक सीमित नहीं है। पानी की उपलब्धता भी इसका बड़ा हिस्सा बनती जा रही है।

कार्बन की असली कीमत पहले से कहीं ज्यादा हो सकती है


रिपोर्ट में शामिल एक और अहम निष्कर्ष कार्बन उत्सर्जन की आर्थिक कीमत से जुड़ा है। नई रिसर्च के मुताबिक, कार्बन डाइऑक्साइड की हर अतिरिक्त टन मात्रा से होने वाला आर्थिक नुकसान पहले लगाए गए अनुमानों से काफी ज्यादा हो सकता है। इस नुकसान में सिर्फ जलवायु से जुड़ी सीधी लागत शामिल नहीं है। बढ़ता तापमान, स्वास्थ्य पर असर, खेती को नुकसान, बुनियादी ढांचे पर दबाव और आजीविका पर असर मिलकर इसकी कीमत बढ़ाते हैं।

अब सवाल यह भी पूछा जा सकता है कि नुकसान के लिए जिम्मेदार कौन है


जलवायु विज्ञान का एक क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहा है, जिसे attribution science कहा जाता है। वैज्ञानिक अब यह पता लगाने की क्षमता विकसित कर रहे हैं कि किसी खास जलवायु प्रभाव में किसी देश, कंपनी या आर्थिक क्षेत्र के उत्सर्जन का कितना योगदान रहा। इससे जलवायु नुकसान की जिम्मेदारी को लेकर बहस का स्वरूप बदल सकता है। अदालतों में चल रहे मामलों से लेकर loss and damage की अंतरराष्ट्रीय बातचीत तक, वैज्ञानिक सबूतों की भूमिका बढ़ सकती है।


World Climate Research Programme के चेयर टिमोथी नैश के मुताबिक, विज्ञान अब सिर्फ यह बताने से आगे बढ़ रहा है कि जलवायु बदलाव हो रहा है। अब यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि किसी खास नुकसान में किस उत्सर्जक का कितना योगदान था।

जलवायु कार्रवाई के खिलाफ तरीके भी बदल रहे हैं


रिपोर्ट में जलवायु कार्रवाई को रोकने की बदलती रणनीतियों को भी जगह दी गई है। जलवायु बदलाव से इनकार करने वाली पुरानी दलीलों के साथ अब greenwashing, भ्रामक समाधान और डिजिटल misinformation जैसे तरीके सामने आ रहे हैं। यानी चुनौती सिर्फ जलवायु संकट से निपटने की नहीं है। सही और गलत जानकारी के बीच फर्क करना भी increasingly important होता जा रहा है।

Energy transition भी हर देश के लिए एक जैसा नहीं


दुनिया में बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता का असर ऊर्जा बदलाव पर भी पड़ रहा है। कुछ देश ऊर्जा सुरक्षा और दूसरी वजहों से renewable और clean energy की ओर तेजी से बढ़ सकते हैं। वहीं कुछ देशों में fossil fuels पर निर्भरता और बढ़ सकती है। इससे दुनिया का energy transition असमान हो सकता है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि climate action से जुड़े trade measures और climate clubs भी विकासशील देशों पर असमान आर्थिक दबाव डाल सकते हैं।

Food system में भी बड़ा बदलाव संभव


रिपोर्ट ने खाद्य व्यवस्था को भी climate action के बड़े रास्तों में शामिल किया है। खास तौर पर ज्यादा plant-rich diets की ओर बदलाव से जलवायु, biodiversity और health को फायदा हो सकता है। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा बदलाव सामाजिक और आर्थिक रूप से न्यायपूर्ण तरीके से होना चाहिए।

भविष्य पूरी तरह तय नहीं हुआ है


इन 10 निष्कर्षों को एक साथ देखें तो तस्वीर थोड़ी साफ होती है। कुछ जलवायु प्रभाव अब टाले नहीं जा सकते। समुद्र का स्तर बढ़ेगा। महासागर गर्म होते रहेंगे। कुछ बर्फ पिघल चुकी है और उसका असर लंबे समय तक रहेगा। लेकिन भविष्य का नुकसान कितना बड़ा होगा, यह अभी भी तय नहीं हुआ है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दुनिया कितनी तेजी से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करती है, ऊर्जा व्यवस्था को कैसे बदलती है, खाद्य और पानी की व्यवस्था को कैसे संभालती है और जलवायु नुकसान की जिम्मेदारी और उसकी लागत को कैसे देखती है।

Arizona State University के Global Futures Laboratory के निदेशक और The Earth League के सह-अध्यक्ष पीटर श्लॉसर के मुताबिक, जलवायु बदलाव कोई दूर की या अमूर्त समस्या नहीं रह गई है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इसके असर और extreme weather को ज्यादा लोग महसूस कर रहे हैं।

नई रिपोर्ट का संदेश इसलिए सीधा है। जो नुकसान अब हो चुका है, उसका एक हिस्सा हमारे साथ रहेगा। लेकिन कितना नुकसान आगे होगा, उस पर आज भी फैसला किया जा सकता है।

(आलेख स्रोत: क्लाइमेट कहानी)

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