जयगांव लैंडपोर्ट के लिए तोरसा की जमीन लिए जाने के खिलाफ एकजुट हुए उत्तर बंगाल के विभिन्न जन संगठनों के प्रतिनिधि, कहा – यह लड़ाई सिर्फ तोरसा की नहीं, उत्तर बंगाल के अनेकों चाय बागानों की है।
अलीपुरद्वार: उत्तर बंगाल के चाय बागान इलाके, आदिवासी इलाके, जंगल और बस्तियों में रहने वाले लोगों के भूमि अधिकार को लेकर 13 सितंबर 2026, रविवार को एक महत्वपूर्ण सम्मेलन का आयोजन किया। 10 संगठनों के 100 से अधिक लोग एक मंच पर जुटे और तय किया गया कि अलग-अलग जगहों व मोर्चे पर चल रहे भूमि संघर्षों को अब एक-दूसरे से जोड़कर साझा आंदोलन आगे बढ़ाया जाएगा।
सम्मेलन में यूनाइटेड फोरम फॉड आदिवासी राइट्स (तराई) के राजकुमार कश्यप, उलगुलान भारत आदिवासी एकता मंच (नागराकाटा) के आशीष कुजूर, एआइसीएआरडी (कालचीनी) के अभिजीत नाग, जाने माने विद्वान नेह इंदवार, उत्तर बंग जन वन श्रमजीवी मंच के रबी राभा, भूखा मनुष्य अधिकार अभियान (उत्तर 24 परगना) के मोहम्मद अली मंडल, पश्चिम बंग खेत मजदूर समिति – PBKMS (कूचबिहार) के राहुल बर्मन, राजी पहाड़ा प्रार्थना सभा (मदारीहाट) के परिमल उरांव ने अपनी बात रखी। पश्मिच बंग चाय मजदूर समिति (PBCMS) की ओर से बाबुल लामा व अनुराध तलवार ने भी सम्मेलन में अपनी बात रखी। बैठक का संचालन पश्चिम बंग चाय मजदूर समिति के किरसेन खड़िया ने किया।
तोरसा की पुश्तैनी जमीन के जबरन अधिग्रहण के खिलाफ सम्मेलन ने एकजुटता जताई और मांग की कि गरीब लोगों की जमीन लेने के बजाय चाय बागान की खाली पड़ी जमीन का इस्तेमाल किया जाए। यह सिर्फ तोरसा की लड़ाई नहीं है, बल्कि चाय बागान क्षेत्र के सभी निवासियों की लड़ाई है।
सम्मेलन में कहा गया कि यह नागराकाटा, मेटेली, माल, बीरपाड़ा, जयगांव, मदारीहाट और पूरे उत्तर बंगाल के उन लोगों की लड़ाई है जो पीढ़ियों से जमीन पर रह रहे हैं। खेती व मेहनत कर रहे हैं, लेकिन आज भी अपनी ही जमीन पर अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
सम्मेलन में उत्तर बंगाल के विभिन्न भूमि संघर्षों को जोड़ने के लिए समन्वय समिति बनाने का निर्णय लिया गया।
सम्मेलन ने उस जमीन व्यवस्था की निंदा की गई जिसने चाय बागान मालिकों के अधिकारों की तो रक्षा की, लेकिन मज़दूरों की पीढ़ियों को उन घरों और ज़मीन पर कोई अधिकार नहीं दिया जिन पर वे रहते और खेती करते आए हैं। आज़ादी के 80 साल बाद भी चाय उगाने वाली आबादी का एक बड़ा हिस्सा असल में भूमिहीन है जबकि उन्हीं की मेहनत ने चाय उद्योग को जिंदा रखा है।
तोरसा की जमीन का मुद्दा
सम्मेलन ने तोरसा के लोगों के साथ पूरी एकजुटता दिखाई गई और जयगांव लैंड पोर्ट के लिए उनकी पुश्तैनी जमीन के अधिग्रहण को तुरंत रोकने की मांग की गई। तोरसा के लोगों से 22 एकड़ ज़मीन लेने का विरोध किया गया और मांग की गई कि सरकार इसके बजाय सड़क के दूसरी ओर मौजूद तोरसा चाय बागान की 20 एकड़ बेकार और खाली ज़मीन का इस्तेमाल करे। जब चाय बागान की बेकार जमीन उपलब्ध है तो उन लोगों की जमीन क्यों ली जाए जो पीढ़ियों से वहाँ रह रहे हैं?
बैठक की शुरुआत तोरसा बागान जमीन बचाओ समिति के 15 सदस्यों ने की, जिनका नेतृत्व मरियम कर रही थीं। उन्होंने विस्थापन के खतरे पर प्रोफेसर वर्गीनियस खाखा, सिराज दत्ता व अनुप्रधा सिंह की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट औपचारिक रूप से जारी किया। समुदाय के दो महीने से ज़्यादा समय से चल रहे संघर्ष के बारे में भी जानकारी दी गई। वकील तमालिका बेरा ने हाई कोर्ट में तोरसा मामले पर पीबीसीएमएस की जनहित याचिका के बारे में अपडेट दिया।
पूरे इलाके में जमीन का संकट
सम्मेलन ने साफ किया कि तोरसा एक बहुत गहरे संकट का सिर्फ ताजा उदाहरण है। उत्तर बंगाल में बंधुआ मज़दूर के तौर पर लाए गए चाय बागान मज़दूरों को लेबर लाइनों में बसाया गया था और कई मामलों में उन्हें मज़दूरी के हिस्से के तौर पर खेती के लिए जमीन दी गई थी। फिर भी न तो औपनिवेशिक सरकार और न ही आजादी के बाद की सरकारों ने उस जमीन पर उनके अधिकारों को मान्यता दी जिस पर वे रहते और खेती करते थे। इसके बजाय, राज्य सरकार चाय बागान मालिकों के लीजहोल्ड हितों की रक्षा करती रही और मज़दूरों के दावों को ऐसे नजरअंदाज किया जैसे उनका कोई अस्तित्व ही न हो।
सम्मेलन में उल्लेख किया गया कि सिलीगुड़ी शहर के विकास के साथ, तराई और पहाड़ी इलाकों के बागानों में काम करने वाले मजदूर तेजी से अपनी जमीन से बेदखल हो रहे हैं।
यही अन्याय अब चाय बागानों से आगे बढ़ गया है। वनाधिकार कानून के बावजूद जंगल में रहने वाले ग्रामीणों को बेदखली का सामना करना पड़ रहा है, जबकि दशकों पहले बसी बस्तियों के पास जमीन का पक्का अधिकार नहीं है। तेज़ी से हो रहे शहरीकरण की वजह से यह संकट जयगाँव, बीरपाड़ा, नागराकाटा, मेटेली, माल और दूसरे कस्बों तक भी पहुँच गया है, जहाँ कई निवासियों और जमीन मालिकों के पास अभी भी अपनी जमीन पर पक्के अधिकार नहीं हैं।
वक्ताओं ने भारत-बांग्लादेश सीमा और मदारीहाट में जमीन से जुड़े विवादों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जिनके पास ज़मीन के कागज़ात हैं, उन्हें भी बिना किसी ठोस बातचीत के अपनी ज़मीन छिन जाने का खतरा हो सकता है।
सम्मेलन में यह बात ज़ोरदार ढंग से कही गई कि सरकार ताकतवर लोगों के फ़ायदे के लिए गरीबों की ज़मीन लेना जारी नहीं रख सकती। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार को अपने ही कानूनों और संविधान के कल्याणकारी सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।
सम्मेलन में अलग-अलग संघर्षों के बिखराव को खत्म करने का आह्वान किया गया। प्रतिभागी इस बात पर सहमत हुए कि उत्तर बंगाल में ज़मीन के अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठनों और समुदायों को एक साथ लाने के लिए एक समन्वय समिति बनाई जाए। सम्मेलन का समापन दो नारों के साथ हुआ – सरकार, तुम कानून मानो, हम तुम्हारे साथ हैं। खून हमारा, मेहनत हमारी, यह जमीन हमारी है।
यूनाइटेड फोरम फॉड आदिवासी राइट्स के प्रमुख राजकुमार कश्यप ने बताया कि सम्मेलन में हमारे संगठन से फिर्दीयुस तिर्की सहित चार अन्य साथी भी सम्मेलन में शामिल हुए।