भाजपा से चाय बागान मजूदरों का टूटा भरोसा, बंगाल के बजट में उन्हें कोई लाभ नहीं

गैर राजनीतिक चाय मजदूर यूनियन पश्चिम बंग चा मजूर समिति ने राज्य के बंद पड़े चाय बागानों के मजदूरों के 400 करोड़ रुपये बकाया की मांग उठायी है और कई बिंदुओं पर अमल की सरकार से अपील की है।

कोलकाता: पश्चिम बंग चा मजूद समिति (PBCMS) ने राज्य में नई भाजपा सरकार द्वारा पेश किए गए बजट में चाय मजदूरों की उपेक्षा का आरोप लगाया है। पीबीसीएमएस ने अपने बयान में बिंदुवार बताया है कि कैसे भाजपा के लिए हमेशा भरोसमंद वोट रहे चाय मजदूरों का उसकी नई सरकार अपने बजट में ध्यान नहीं रख पायी है। समिति ने कहा है कि उत्तर बंगाल के चाय बागान मजदूर बीजेपी के सबसे वफ़ादार वोटरों में से रहे हैं और उन्होंने बार-बार बीजेपी के विधायकों को चुना है। मज़दूरों को उम्मीद थी कि बीजेपी की नई सरकार आखिरकार उनकी लंबे समय से चली आ रही परेशानियों को दूर करेगी, लेकिन उनका यह भरोसा टूट गया है। पश्चिम बंगाल के 2026-27 के बजट से चाय बागान मज़दूरों को, खासकर बंद और बीमार बागानों के मज़दूरों को, बहुत कम राहत मिली है।

राज्य के बजट में यह माना गया है कि चाय बागान मजदूर खराब स्वास्थ्य सुविधाओं, भोजन की कमी और वेतन मिलने में देरी जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, लेकिन इन समस्याओं को हल करने के लिए कोई स्पष्ट या पर्याप्त वित्तीय मदद का वादा नहीं किया गया है। पीबीसीएमएस ने कहा है कि प्रस्तावित चाय बागान मदूर विकास बोर्ड सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन बिना स्पष्ट बजट आवंटन, अधिकारों, समय-सीमा वाली योजना और मज़दूरों की भागीदारी के, इसके सिर्फ़ एक और घोषणा बनकर रह जाने का खतरा है।

पीएम चा श्रमिक प्रोत्साहन योजना में भी सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आवास, शिक्षा, पोषण और आजीविका के नए साधनों की बात की गई है। लेकिन इन सबके लिए, यह 3.5 लाख मज़दूरों को केवल 314 करोड़ रुपये देती है, जो प्रति व्यक्ति सिर्फ़ 9000 रुपये है।

बजट का सबसे कमज़ोर पहलू बंद चाय बागानों के मामले में इसका रवैया है। इसमें बस इतना कहा गया है कि सरकार बंद बागानों की समस्याओं और इस सेक्टर की समग्र स्थिति को सुधारने के लिए चाय उद्योग के साथ मिलकर काम करेगी। यह नाकाफी है। बंद चाय बागानों के मज़दूर भुखमरी, कर्ज़, पलायन, चिकित्सा सुविधाओं की कमी और वेतन, पीएफ, ग्रेच्युटी व अन्य बकाया राशि को लेकर अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं। उन्हें सीधी राहत, बागान फिर से खोलने की योजना, बकाया भुगतान, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रोज़गार में मदद की ज़रूरत है। बजट में इसके लिए कोई खास आवंटन नहीं किया गया है।

उत्तर बंगाल का एक चाय बागान।

पीबीसीएमएस ने सवाल उठाया है कि डुअर्स में 29 बंद और छोड़े गए चाय बागानों के मज़दूरों की लगभग 400 करोड़ रुपये़ की बकाया राशि का क्या होगा? चाय बागान की बकाया राशि से जुड़ा सुप्रीम कोर्ट का मामला अब पूरा होने वाला है। असम सरकार ने बागान मज़दूरों की बकाया राशि के तौर पर 640 करोड़ रुपये का भुगतान किया है। हमारी राज्य सरकार को मज़दूरों की यह बकाया राशि तुरंत देनी चाहिए और फिर उन मनमाने मालिकों से यह रकम वसूलनी चाहिए जिन्होंने मज़दूरों का भारी बकाया छोड़कर बागान छोड़ दिए थे।

पीबीसीएमएस ने सवाल उठाया है कि बीमार और बंद बागानों को फिर से खोलने के लिए भारी वित्तीय निवेश की ज़रूरत है, न कि सिर्फ़ एसओपी, बोर्ड और कमेटियों की। जब लंकापाड़ा की फ़ैक्ट्री, इमारतें और संपत्ति लूटकर बेची जा चुकी हैं, तो उसे फिर से कैसे खोला जा सकता है? रामझोरा, बुंदापानी और मधु चाय बागान तब तक अपने पैरों पर कैसे खड़े हो पाएंगे, जब तक कि फैक्टरियों और बुनियादी ढांचे को फिर से शुरू करने के लिए आर्थिक मदद न दी जाए? सरकार को फैक्टरियों, इमारतों, वर्किंग कैपिटल और मजदूरों के बकाये के लिए एक खास रिवाइवल फंड बनाना चाहिए।

पीबीसीएमएस ने कहा है कि बागानों को संभालने और चलाने के लिए मजदूरों की सहकारी समितियों को भी मदद की ज़रूरत है। कई मामलों में, कोई भी मालिक निवेश करने को तैयार नहीं होता। दूसरे मामलों में, मालिक कुछ समय के लिए आते हैं, बागान से सब कुछ निकाल लेते हैं और मजदूरों को और भी बुरी हालत में छोड़ जाते हैं।

बजट में मजदूरों की ज़िंदगी के बजाय चाय उद्योग, पर्यटन और प्रोसेसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा ध्यान दिया गया है। चाय पर्यटन के लिए ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव (लैंड डाइवर्जन) को 30 प्रतिशत से घटाकर 15 प्रतिशत करना स्वागत योग्य है, लेकिन ऐसा बदलाव करने की इजाज़त ही क्यों दी जाए? चाय बागान की ज़मीन ही आजीविका, घर और सामुदायिक जीवन का आधार है। सरकार को इस प्रावधान को पूरी तरह से हटा देना चाहिए।

चाय बागान के मज़दूरों को अस्पष्ट वादों की ज़रूरत नहीं है। उन्हें लागू करने योग्य अधिकार, सीधी मदद और रिवाइवल फंड की ज़रूरत है।

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