जापान से एशिया पहुंच रही अमेरिकी एलएनजी, जलवायु पर असर 17 कोयला बिजलीघरों के बराबर

जब एशिया के कई देश ऊर्जा सुरक्षा की बात करते हैं, तो अक्सर उनकी नज़र एलएनजी पर जाती है। इसे कोयले की तुलना में अपेक्षाकृत कम उत्सर्जन वाला ईंधन बताया गया। इसे एनर्जी ट्रांजिशन का एक पुल कहा गया। और, इसे ऐसी व्यवस्था के रूप में पेश किया गया जो देशों को धीरे-धीरे रिन्यूएबल एनर्जी की ओर ले जाएगी।

लेकिन, एक नई रिपोर्ट इस कहानी का दूसरा पक्ष सामने रखती है।

जलवायु और ऊर्जा शोध संस्था ज़ीरो कार्बन एनालिटिक्स के विश्लेषण के मुताबिक जापान द्वारा एशियाई देशों को दोबारा बेची गई अमेरिकी एलएनजी से होने वाला कुल उत्सर्जन एक साल में लगभग 17 कोयला आधारित बिजलीघरों के बराबर है।

रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब एशिया के कई देश ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर एलएनजी आयात बढ़ा रहे हैं और जापान इस व्यापार में पहले से कहीं बड़ी भूमिका निभा रहा है।

जापान लंबे समय से दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी आयातकों में शामिल रहा है। लेकिन देश में गैस की मांग घटने के साथ उसके पास अतिरिक्त एलएनजी बचने लगी है। रिपोर्ट के मुताबिक जापानी कंपनियां अब इस अतिरिक्त गैस को एशिया के दूसरे देशों में बेच रही हैं, जबकि जापान की सरकार और वित्तीय संस्थान क्षेत्र में गैस अवसंरचना को भी समर्थन दे रहे हैं।

रिपोर्ट के लेखक और जीरो कार्बन एनालिटिक्स के एशिया क्षेत्रीय शोधकर्ता यू सन चिन कहते हैं कि जापान की अतिरिक्त एलएनजी आपूर्ति का लगभग एक-तिहाई हिस्सा एशिया के देशों द्वारा खरीदा जा रहा है। उनके मुताबिक इन पुनर्विक्रयों से होने वाले उत्सर्जन ऐसे क्षेत्र के लिए चिंता का विषय हैं जो पहले से ही चरम मौसम की घटनाओं के प्रति बेहद संवेदनशील है।

कहते हैं कि जापान की अतिरिक्त एलएनजी आपूर्ति का लगभग एक-तिहाई हिस्सा एशिया के देशों द्वारा खरीदा जा रहा है। उनके मुताबिक इन पुनर्विक्रयों से होने वाले उत्सर्जन ऐसे क्षेत्र के लिए चिंता का विषय हैं जो पहले से ही चरम मौसम की घटनाओं के प्रति बेहद संवेदनशील है।

लेकिन इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा गैस के जलने से पहले शुरू होता है। अमेरिका में गैस उत्पादन, उसे तरल बनाने की प्रक्रिया। विशाल जहाजों के जरिए हजारों किलोमीटर की समुद्री यात्रा। फिर आयात टर्मिनल, पुनर्गैसीकरण और अंततः बिजली उत्पादन।

रिपोर्ट ने इस पूरी आपूर्ति श्रृंखला से होने वाले उत्सर्जनों का आकलन किया है। यहीं मीथेन की भूमिका सामने आती है।

एलएनजी मुख्य रूप से मीथेन गैस से बनी होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार वातावरण में छोड़े जाने के बाद शुरुआती 20 वर्षों में मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में लगभग 80 गुना अधिक गर्मी पैदा कर सकती है।

विश्लेषण के मुताबिक एलएनजी आपूर्ति श्रृंखला से होने वाले कुल उत्सर्जनों का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा मीथेन से आता है। यह गैस उत्पादन, प्रसंस्करण और परिवहन के दौरान होने वाले रिसावों के साथ-साथ अंतिम उपयोग के दौरान भी निकलती है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की 2026 ग्लोबल मीथेन ट्रैकर रिपोर्ट भी चेतावनी देती है कि फॉसिल फ्यूल क्षेत्र से होने वाले मीथेन उत्सर्जन अभी रिकॉर्ड स्तर के करीब बने हुए हैं।

लेकिन जलवायु जोखिम इस कहानी का केवल एक हिस्सा है। दूसरा हिस्सा आर्थिक जोखिमों से जुड़ा है।

हाल के वर्षों में फिलीपींस, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों ने ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने के लिए एलएनजी आयात बढ़ाया है। लेकिन पश्चिम एशिया संकट के बाद बढ़ती गैस कीमतों ने इन अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव भी बढ़ाया है।

इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स और फाइनेंशियल एनालिसिस के सैम रेनॉल्ड कहते हैं कि जापान की घरेलू एलएनजी मांग घट रही है, इसलिए जापानी कंपनियां दूसरे देशों में नए ग्राहक तलाश रही हैं। उनके मुताबिक इससे उभरती अर्थव्यवस्थाएं दशकों तक महंगे और अस्थिर ईंधन पर निर्भर हो सकती हैं और रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बदलाव धीमा पड़ सकता है।

नेशनल रिसोर्स डिफेंस काउंसिल की श्रुति शुक्ला कहती हैं कि एशिया को एक और आयातित फॉसिल फ्यूल पर निर्भर बनाने के बजाय क्षेत्र को स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ाने की जरूरत है। उनके मुताबिक एलएनजी देशों को महंगे ईंधन, मूल्य अस्थिरता और भू-राजनीतिक झटकों के प्रति संवेदनशील बनाए रख सकता है।

थाईलैंड की क्लाइमेट फिनांस नेटवर्क थाईलैंड के शोध के अनुसार देश की परिचालित और प्रस्तावित एलएनजी टर्मिनल क्षमता का लगभग आधा हिस्सा भविष्य में आर्थिक रूप से अव्यवहारिक हो सकता है। इससे लगभग 100 अरब बाट मूल्य की परिसंपत्तियां फंसी हुई संपत्ति में बदलने का जोखिम पैदा हो सकता है।

बांग्लादेश के सेंटर फॉर पॉलिसी डायलॉग के शोध निदेशक डॉ. खोंडाकर गोलम मोअज़्ज़म का कहना है कि जापान के साथ बढ़ती ऊर्जा साझेदारी देश की एलएनजी निर्भरता को और गहरा कर रही है। उनके मुताबिक इससे रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश के विकल्प सीमित हो सकते हैं।

रिपोर्ट याद दिलाती है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रखने के लिए दुनिया को अगले कुछ वर्षों में अपने उत्सर्जन लगभग आधे करने होंगे। ऐसे में नई फॉसिल फ्यूल अवसंरचना जोड़ना इस लक्ष्य को और कठिन बना सकता है।

एशिया पहले से ही चक्रवातों, बाढ़, समुद्री तूफानों और भीषण गर्मी की घटनाओं से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक है।

यही वजह है कि यह बहस सिर्फ गैस व्यापार की नहीं है। यह उस रास्ते की बहस है जिसे एशिया अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए चुनेगा। एक रास्ता आयातित फॉसिल फ्यूल की ओर जाता है। दूसरा रास्ता रिन्यूएबल एनर्जी, भंडारण तकनीकों और घरेलू बिजली उत्पादन की तरफ।

और आज यह सवाल पहले से कहीं बड़ा दिखाई देता है कि एशिया अपनी ऊर्जा सुरक्षा किस पर खड़ी करना चाहता है।

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