झारखंड में 25 साल बाद पेसा लागू, फिर भी समुदाय व जन संगठनों के क्यों हैं सवाल?

झारखंड गठन के करीब ढाई दशक बार राज्य में पहली बार पेसा नियमावली को लागू किया गया है। लेकिन, इस नियमावली के कई प्रावधानों को लेकर बहस तेज हो गई है। एक पक्ष का आरोप है कि शब्दों के हेर-फेर से पेसा कानून कमजोर हो गया है। वहीं दूसरा पक्ष नियमावली के सकारात्मक पक्षों को लेकर आगे बढ़ने और जरूरी बदलावों को शामिल कराने के लिए कोशिश जारी रखने पर जोर दे रहा है।

विशाल कुमार जैन की रिपोर्ट

झारखंड कैबिनेट ने 23 दिसंबर 2025 को जब पेसा नियमावली को मंजूरी दी, तो राज्य की 32 जनजातियों के करीब 86 लाख आदिवासियों के लिए यह ऐतिहासिक दिन बन गया। अब पांचवीं अनुसूची में आने वाले 13 जिलों में पारंपरिक ग्राम सभाएं शासन की सबसे मजबूत इकाई होंगी। ग्राम सभा के अध्यक्ष ऐसे लोग होंगे, जो परम्परा से प्रचलित रीति-रिवाजों से मान्यता प्राप्त हैं। ग्राम सभा को प्राकृतिक और सामुदायिक संसाधनों के प्रबंधन का अधिकार दिया गया है।

हालांकि, दो जनवरी 2026 को नियमावली का मसौदा जारी होने के बाद पारंपरिक ग्राम सभाओं के गठन, उनके अधिकारों और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं, क्योंकि “पारंपरिक ग्राम, ग्राम सभाओं तथा उनकी सीमाओं की मान्यता और प्रकाशन की जिम्मेदारी” उपायुक्त (जिलाधिकारी) को दी गई है।

रांची के पास कुटियातू गांव के ग्राम प्रधान बंधना उरांव ने मोंगाबे-हिंदी से अपनी आशंकाएं जाहिर की, “जो नियमावली बनाई गई है, उसमें कहीं न कहीं पांरपरिक पदों को खत्म करने की कोशिश है। जो हमारे पुरखों की “रुढ़िजन्य व्यवस्था” चली आ रही है उसे मिटाने की कोशिश है।”

अधिकारों पर बहस

देश में सबसे ज्यादा पेसा गांवों (16491) वाले झारखंड में पारंपरिक स्वशासन की लंबी परंपरा रही है। जहां त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था चुनाव पर आधारित है, वहीं पेसा में पारंपरिक स्वशासन के आधार पर आदिवासी “रुढिजन्य विधि” (Customary Law) या पारंपरिक कानून के हिसाब से अपनी समस्याएं सुलझाते हैं और आमराय से फैसले लेते हैं।

पूर्वी सिंहभूम जिले में पोटका प्रखंड के बांगो ग्राम सभा के निवासी सिद्धेश्वर सरदार पारंपरिक स्वशासन की अहमियत पर मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “यह अंतर समझना होगा कि उपायुक्त प्रशासन की प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जबकि ग्राम सभा स्वशासन की प्रक्रिया है।”

रांची में पेसा पर आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में मौजूद लोग। पेसा पर एक वर्ग का मानना है कि सकारात्मक चीजों को लेकर आगे बढ़ा जाए और जो चीजें नियमावली में छूट गई हैं, उनके लिए प्रयास जारी रखे जाएं। तस्वीर सौजन्य – राकेश कुमार राऊत/मोंगाबे हिंदी।

साल 2023 में पंचायती राज विभाग में निदेशक रहते हुए नियमावली का मसौदा तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वाली निशा उरांव कहती हैं, “शब्दों के हेर-फेर से बहुत बड़ा बदलाव आ गया है, क्योंकि पूरी शक्तियां उपायुक्त के पास जाती हुई दिख रही हैं। इसमें रुढ़ियां यानी परंपरागत व्यवस्थाएं गौण हो गई हैं और इससे कई विवाद उत्पन्न होंगे। कई सारे दावे आएंगे। दूसरी बात, यह नहीं बताया गया है कि ग्राम सभा (नई) का प्रधान कौन होगा।”

खूंटी जिले के डोड़मा गांव के सुदर्शन भेंगरा मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं कि जब 2023 से पेसा नियमावली का मसौदा बन रहा था, तो हमने पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था की उच्चतर इकाइयां के अनुरूप ग्राम सभा की सीमा तय करने का सुझाव दिया था, लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया गया।

हालांकि, सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अगर इस नियमावली को व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ढांचे के साथ जोड़कर देखा जाए, तो यह सबसे अच्छी है और मौजूदा परिदृश्य में इससे बेहतर की उम्मीद नहीं की जा सकती थी।

रांची स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ कम्युनिटी फॉरेस्ट गवर्नेंस के निदेशक संजय बसु मल्लिक जमीनी हालात में आए बदलाव को इसकी वजह बताते हैं। उन्होंने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “गांवों की आबादी में व्यापक बदलाव हुए हैं। मेरे बचपन में रांची और उसके आसपास आदिवासियों की बहुलता थी। अब गांवों में आदिवासियों का एक टोला बन गया है। अब वहां पेसा लागू होने पर यह दलील दी जाती है कि यह अल्पसंख्यकों का शासन है। अगर हम शामिल नहीं है, तो हम इसे क्यों मानेंगे। ये सवाल पेसा कानून के बाद से उठने शुरू हो गए थे और देरी की वजह भी यही है।”

जानकार लाभुकों के चयन में भी ग्राम सभाओं की शक्तियों को कम करने का आरोप लगा रहे हैं। केंद्र सरकार का पेसा कानून कहता है कि (ग्राम सभा) गरीबी उन्मूलन और अन्य कार्यक्रमों के तहत लाभुकों के रूप में व्यक्तियों की पहचान या चयन के लिए जिम्मेदार होगी। लेकिन पेसा नियमावली के मुताबिक लाभुकों का चयन तो ग्राम सभा कर सकेगी, लेकिन सक्षम पदाधिकारियों के लिए यह आवश्यक होगा कि संबंधित विभाग की योजनाओं के नियमानुसार ग्राम सभा द्वारा अनुमोदित सूची को ध्यान में रखते हुए अग्रेतर कार्रवाई करें।

गिरिडीह जिले में पारसनाथ पहाड़ के निकट मुख्य मार्ग पर वनोपज बेच कर आजीविका अर्जित करती एक महिला। फोटो – राहुल सिंह।

उरांव कहती हैं कि हमने ग्राम सभा की सूची को अनिवार्य बनाया था, लेकिन अब इसे भी बदल दिया गया है।

नई नियमावली आने के बाद विकास योजनाओं के लिए सहमति से जुड़ा सवाल भी बहस के केंद्र में है। पेसा कानून कहता है कि पंचायत द्वारा लागू करने से पहले हर ग्राम सभा सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए योजनाओं, कार्यक्रमों और प्रोजेक्ट्स को मंजूरी देगी। झारखंड सरकार की नियमावली में ग्राम सभा के साथ-साथ क्षेत्रफल के आधार पर पंचायत समिति और जिला परिषद से भी सहमति लेने का प्रावधान है।

ट्राइबल सब-प्लान और डीएमएफटी फंड बाहर

नई नियमावली में लघु खनिज (मिट्टी, पत्थर, बालू, मोरम इत्यादि) पर ग्राम सभाओं को दिया गया है। अब कैटेगरी-1 के बालू घाटों की संचालक ग्राम सभा होगी। वहीं लघु वनोपोज पर ग्राम सभा का अधिकार होगा। हालांकि, केंदूपत्ता का “संग्रहण, प्रबंधन और विपणन बिहार केन्दूपत्ती (व्यापार नियंत्रण) अधिनियम, 1973 और उसके बनाए गए नियमों” के तहत होगा।

वैसे, जानकार ट्राइबल सब प्लान (टीएसपी) और डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन ट्रस्ट (डीएमएफटी) फंड को पेसा नियमवाली से बाहर रखने पर भी हैरानी जता रहे हैं। झारखंड सरकार की ओर से 2025-26 के बजट में अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के लिए 3384.46 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था।

वहीं एक दिसंबर, 2025 तक केंद्र की तरफ से टीएसपी में 41 मंत्रालयों और विभागों की 204 योजनाओं के तहत 1,27434.2 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे। हालांकि, झारखंड सरकार का आरोप है कि उसे टीएसपी के मद में 2021-22 से 2023-25 तक महज  3,515.11 करोड़ रुपए केंद्र से मिले।

दूसरी तरफ, राज्य में पेसा वाले 13 जिलों सहित सभी 24 जिलों में में डीएमएफटी फंड है। नवंबर 2025 तक इस फंड में कुल 17282.41 करोड़ रुपए जमा थे। वहीं लघु खनिज के मद में 1354.82 करोड़ रुपए जमा हुए थे।

उरांव ने कहा, “2023 में जो मसौदा तैयार हुआ था, उसमें टीएसपी और डीएमएफटी फंड को शामिल किया गया था और और फंड खर्च करने के लिए ग्राम सभा की सहमति या अनुमति को जरूरी बनाया था।”

आदिवासी क्षेत्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष ग्लैडसन डुंगडुंग इस फैसले को डीएमएफटी फंड में फैली कुव्यवस्था से जोड़कर देखते हैं। वह कहते हैं, “मैंने मुख्यमंत्री समेत सभी वरिष्ठ अधिकारियों को चिट्ठी लिखकर डीएमएफटी फंड में लूट का आरोप लगाया था। इस फंड से कई ऐसे काम हुए हैं जिनका खनन प्रभावित समुदायों की भलाई से कोई लेना-देना नहीं है। मेरी बात ऑडिट रिपोर्ट से भी साबित होती है।“

डीएमएएफटी फंड को लेकर बढ़ती शिकायतों के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सभी जिलों में जांच का आदेश दिया है। यही नहीं, प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना की गाइडलाइन कहती है कि डीएमएफटी फंड का इस्तेमाल खनन प्रभावित इलाकों की ग्रामसभा द्वारा चुनी गई योजनाओं पर किया जाना चाहिए और उन्हें अगले वित्तीय वर्ष के लिए वार्षिक कार्य योजना में शामिल किया जाना चाहिए।

बोकारो जिले के बेरमो-फुसरो क्षेत्र में स्थित एक कोयला खदान। राज्य में खनन क्षेत्र से हासिल होने वाले डीएमएफटी के पैसे को अन्य क्षेत्र में खर्च करने के आरोप लगते रहे हैं। फोटो – राहुल सिंह।

केंद्र की ओर से 1996 में बनाया गया पेसा कानून भी कहता है कि स्थानीय योजनाओं और ऐसी योजनाओं के लिए संसाधनों पर नियंत्रण रखने की शक्ति, जिसमें जनजातीय उप-योजनाएं भी शामिल हैं; ग्राम सभा को दी जानी चाहिए।

मल्लिक कहते हैं कि आदिवासी सांस्कृतिक रूप से जंगल से जुड़े हुए हैं और इसलिए सिर्फ ट्राइबल सब-प्लान ही नहीं कैम्पा का पूरा फंड भी ग्राम सभा को ही जाना चाहिए। आखिरकार जंगल की देखभाल यही लोग करते हैं।

भूमि अधिग्रहण पर विवाद

पेसा नियमावली में जमीन अधिग्रहण के बारे में महज दो लाइन लिखी गई है। नियमावली कहती है, “भू-अर्जन एवं पुनर्स्थापन विषय अंतर्गत ग्राम सभा से पूर्व सहमति प्राप्त की जाएगी एवं उक्त विषय पर विचार हेतु ग्राम सभा की प्रत्येक बैठक में कोरम की बाध्यता अनिवार्य होगी।”

जानकार मानते हैं कि नियमावली में भूमि अधिग्रहण पर और ज्यादा काम करने की जरूरत थी, क्योंकि स्पष्टता के अभाव में कंपनी या समुदाय दोनों के लिए समस्याएं पैदा होंगी। भूमि अधिग्रहण की धारा 41 भी शेड्यूल इलाकों में जमीन अधिग्रहण को अंतिम विकल्प बताता है।

उरांव कहती हैं, “सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े नियमगिरि केस में संसूचित (पूरी तरह सोच-विचार करना) सहमति (informed consent) की बात कही है। संसूचित सहमति और साधारण सहमति में बहुत फर्क है। संसूचित सहमति का मतलब है कि हर किसी से सहमति लेना और परियोजना की पूरी जानकारी देने से है। पुराने मसौदे में भी संसूचित सहमति की ही बात थी।”

झारखंड में देश के कुल खनिज का लगभग 40 फीसदी पाया जाता है। इसलिए, यहां हमेशा से भूमि अधिग्रहण बड़ा मुद्दा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक सिर्फ सेंट्रल कोल्डफील्ड लिमिटेड ने राज्य में 73967 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित की है। आंकड़े के मुताबिक एक जनवरी 1980 से 30 अगस्त, 2011 तक खनन गतिविधियों के लिए 14,500.84 हेक्टेयर वन भूमि आवंटित की गई।

रवरी को रांची में आयोजित सीएमएस वातावरण पर्यावरण फिल्म महोत्सव में पारंपरिक नृत्य पेश पेश करती छात्राएं। पेसा कानून का मकसद आदिवासियों की संस्कृति और उनकी परंपराओं को कानूनी सुरक्षा देते हुए बचाए रखना है। तस्वीर सौजन्य – सीएमएस वातावरण//मोंगाबे हिंदी।

1996 का कानून भी कहता है कि अधिसूचित क्षेत्र में विकास परियोजनाओं के लिए जमीन लेने से पहले और ऐसे प्रोजेक्ट से प्रभावित लोगों को फिर से बसाने या उनका पुनर्वास करने से पहले ग्राम सभा या सही स्तर की पंचायतों से सलाह ली जाएगी।

मल्लिक कहते हैं कि झारखंड में खेती से ज्यादा खनिज संपदा और जंगल का महत्व है, क्योंकि अधिकतर इलाकों में आज भी खेती एक बार ही होती है। इसलिए, जमीन अधिग्रहण से जुड़े मामलों में ग्राम सभा को ज्यादा सशक्त बनाना जरूरी है।

डुंगडुंग भी संसूचित सहमति पर जोर देते हुए आरोप लगाते हैं कि बैठक बुलाने का अधिकार ग्राम सभा की जगह पंचायत के मुखिया को दिया गया है। वह आगे कहते हैं, “सामुदायिक संसाधनों में सरना, मसना, जाहेरथान तो शामिल किए गए हैं, लेकिन उसमें जंगल नहीं है। गांव की परती जमीन नहीं है। यह भी तो गांव के संसाधन हैं।“

केंद्र के कानून में अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि के हस्तांतरण को रोकने और किसी भी अनुसूचित जनजाति की गैर-कानूनी तरीके से ली गई भूमि को वापस दिलाने का अधिकार ग्राम सभा को दिया गया है। इस मामले में उरांव का आरोप है कि अवैध कब्जा हटाने का अधिकार अब डीसी को दे दिया गया है जो पहले पारंपरिक ग्राम सभा के पास था।

वहीं झारखंड नरेगा वॉच के संयोजक जेम्स हेरंज मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं कि संविधान की तरह ही पेसा नियमावली में भी संशोधन की संभावना बनी हुई है। बेहतर यही होगा कि नियमावली में जो सकारात्मक चीजें हैं उसका फायदा उठाया जाए और जो कमियां है उसे दूर करने क लिए प्रयासरत रहें।

(यह आलेख हमने मोंगाबे हिंदी से साभार प्रकाशित की है। आप मोंगाबे हिंदी की वेबसाइट पर जाकर इस खबर को इस लिंक को क्लिक कर पढ सकते हैं।)

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