30% जमीन सेठों को व 5 डिसमिल का पट्टा चाय मजदूरों को देने के फैसले के खिलाफ जुटे हजारों लोग

चाय मजदूर ममता बनर्जी सरकार के उस फैसले का लगातार विरोध कर रहे हैं, जिसमें मुख्यमंत्री ने चाय बागानों की 30 प्रतिशत जमीन उद्योगपतियों को देने का ऐलान किया है। इस साल सात फरवरी को इससे संबंधित एक अधिसूचना भी राज्य सरकार की ओर से जारी की गई है।


सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) : पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के चाय बागानों व मजदूरों के संबंध में लिए गए फैसलों के खिलाफ हजारों चाय मजदूर 20 मार्च, 2025 को उत्तर कन्या अभियान में जुटे और अपनी मांगों के समर्थन में प्रदर्शन किया। उत्तर कन्या उत्तर बंगाल इलाके के लिए राज्य सरकार का सेटेलाइट सचिवालय है। प्रदर्शनकारियों ने ममता बनर्जी सरकार के चाय बागानों की 30 प्रतिशत जमीन उद्योगपतियों को देने और चाय मजदूरों को पांच डिसमिल की भूमि पट्टा देने की नीति का विरोध किया।

चाय मजदूरों ने इस दौरान कहा कि इस जमीन में हमारे पूर्वजों का खून और पसीना मिला हुआ है और ऐसे में सरकार इसे कैसे पूंजीपतियों को दे सकती है।

प्रदर्शनकारियों का कहना था कि पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा हाल ही में लिए गए एक निर्णय ने राज्य के चाय बागानों में बसे लाखों लोगों के जीवन और उनकी पहचान पर गहरा संकट खड़ा कर दिया है। कोलकाता में आयोजित बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घोषणा की कि चाय बागानों की 30 प्रतिशत जमीन पूंजीपतियों को सौंपी जाएगी। इस घांष को अमली जामा पहनाने के लिए राज्य सरकार ने सात फरवरी 2025 को एक अधिसूचना जारी की, जिसके तहत यह योजना लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

इससे पहले 2019 में भी सरकार ने चाय बागानों की 15 प्रतिशत जमीन पूंजीपतियों को देने की योजना बनाई थी, जो अब इस नए फैसले के साथ और विस्तारित हो गई है। यानी अब उन्हें 30 प्रतिशत जमीन मिल सकेगी।

पश्चिम बंगाल के उत्तरी छोर पर स्थित चाय बागान, जैसे दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार, न केवल राज्य की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, बल्कि ये लाखों चाय मजदूरों का घर भी हैं। इनमें मुख्य रूप से आदिवासी और गोरखा समुदाय के लोग शामिल हैं, जो लगभग 200 वर्षों से यहां बसे हुए हैं। इन बागानों को इनके पूर्वजों ने अपने खून-पसीने से सींचकर तैयार किया था।

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चाय श्रमिकों का कहना है कि हम भी उसी विरासत के वंशज हैं। पर, आज यह देखकर दुःख होता है कि सरकार इस ऐतिहासिक धरोहर को पूंजीपतियों के हवाले कर रही है, जबकि इन बागानों में रहने वाले मजदूरों को अभी तक जमीन का मालिकाना हक नहीं मिला है।

चाय बागानों में मजदूरों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। उनकी आजीविका और आवास पूरी तरह बागान में काम पर निर्भर है। जब तक वे मजदूरी करते हैं, तब तक ही उन्हें घर में रहने का अधिकार है। अगर काम छूटा, तो घर भी छिन लिया जाता है। इस व्यवस्था ने मजदूरों की पीढ़ियों को एक दुष्चक्र में फंसा दिया है, जहां मजदूर का बच्चा मजदूर ही बनता है। यह एक तरह से बंधुआ मजदूरी जैसी स्थिति है।

चाय मजदूर नेता किरसेन खड़िया के अनुसार, जमीन के पूर्ण मालिकाना हक की मांग को लेकर बार-बार आंदोलन हुए, लेकिन सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इसके बजाय, मजदूरों को 5 डेसीमल का रिफ्यूटी पट्टा देने की पेशकश की गई है, जो एक तरह से भीख से ज्यादा कुछ नहीं है। पट्टे पर हासिल इस जमीन को न तो बेचा जा सकता है, न ट्रांसफर किया जा सकता है, न ही इसका कोई आर्थिक उपयोग संभव है। यह आजादी नहीं, बल्कि गुलामी की एक नई परिभाषा है।

यूनाइटेड फोरम फॉर आदिवासी राइट्स और ज्वाइंट एक्शन कमेटी टीडीएच की अगुवाई में इस अभियान का आयोजन किया गया। दोनों संगठनों ने अपने साझा बयान में कहा है कि सरकार चाय बागानों की 30 प्रतिशत जमीन पूंजीपतियों को सौंप रही है, जहां होटल, लॉज, रेस्तरां और टाउनशिप जैसी परियोजनाएं बनने की योजना है। इससे न केवल पर्यावरण को भारी नुकसान होगा, बल्कि नदियों का प्रदूषण और प्राकृतिक संतुलन का विनाश भी होगा। इससे यहां रहने वाले समुदायों की सांस्कृतिक पहचान और जीवनशैली भी खतरे में पड़ जाएगी। यह विकास के नाम पर विनाश का रास्ता है, जो चाय बागानों में बसे लाखों आदिवासी और गोरखा लोगों के अस्तित्व को मिटाने की ओर ले जाएगा।

संगठनों के संयुक्त बयान में कहा गया है कि सरकार को सबसे पहले चाय बागानों में रहने वाले लोगों को उनकी जमीन का पूर्ण मालिकाना हक देना चाहिए। चाय मजदूर परिवारों को पांच डिसलिम के पट्टे की भीख नहीं चाहिए। हर व्यक्ति को उसकी वास्तविक हिस्सेदारी के अनुसार, बिना किसी शर्त के, जमीन का अधिकार मिलना चाहिए। यह न केवल न्याय की मांग है, बल्कि हमारे पूर्वजों की मेहनत, हमारे समुदाय की पहचान और हमारी भावी पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने का एकमात्र रास्ता है। सरकार को पूंजीपतियों के हितों से ऊपर उठकर उन लोगों की सुध लेनी चाहिए, जिन्होंने इस धरती को अपने श्रम से समृद्ध बनाया।

वक्तव्य के अनुसार, उत्तर कन्या अभियान एक गैर राजनीतिक जनआंदोलन है, जिसमें करीब 20 हजार लोग जुड़े जो तराई डूवर्स और पहाड़ से आए थे।

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