तेंदुओं की अधिक संख्या मनुष्यों पर अधिक हमले की वजह नहीं, जलपाईगुड़ी पर केंद्रित स्टडी में खुलासा

उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के चाय बागान क्षेत्र में तेंदुओं के हमले के पैटर्न पर सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज का एक नया रिसर्च हाल में आया है जिसमें वन्य पशुओं के हमलों के तौर-तरीके के बहु प्रचारित धारणाओं को खारिज किया गया है।

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में 630 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में तेंदुओं के हमले के पैटर्न पर केंद्रित सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज की एक स्टडी हाल में प्रकाशित हुई है। इस हमले में मीडिया के उस प्रचारित धारणा को खारिज किया गया है कि जिन क्षेत्रों में अधिक संख्या मेें तेंदुए या उनके शावक अक्सर देखे जाते हैं, वहां हमले अधिक होते हैं। यह अध्ययन इस आम धारणा को भी चुनौती देता है कि अधिक तेंदुओं का मतलब अधिक हमले होते हैं।

अध्ययन क्षेत्र में गाँव और कृषि क्षेत्र (क्षेत्रफल का 21%), चाय के बागान (35%), जंगल (25%), नदी के किनारे और परती क्षेत्र शामिल थे। यह काफी हद तक ग्रामीण परिदृश्य है, जिसमें 80% आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। पशुपालन एक प्रमुख व्यवसाय है, जिसमें 23% आबादी अपनी आजीविका के लिए मवेशी, बकरी, सूअर और मुर्गी जैसे घरेलू पशुओं पर निर्भर है।

यह अध्ययन इस तथ्य पर फोकस करता है कि मानवीय गतिविधियां, परिदृश्य विशेषताएं और मौसमी पैटर्न तेंदुओं के साथ अंतःक्रिया या इंटरेक्शन को आकार देती हैं। स्थानांतरण जैसी प्रतिक्रियात्मक रणनीतियों के बजाय उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में संघर्ष या टकराव की स्थितियों को कम करने की रणनीतियों को विकसित करना और उसका परीक्षण करने के लिए लक्षित अनुसंधान और संरक्षण पहलों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

अध्ययन के आधार पर यह सुझाव दिया गया है कि चाय के बागान और वन क्षेत्र अस्वाभाविक पड़ोसी लग सकते हैं, लेकिन सोची हुई रणनीतियों के साथ उन्हें युद्ध का का मैदान नहीं बनाना चाहिए। यह समझना कि तेंदुओं के हमले कब, कहां और क्यों होते हैं, तेंदुओं के साथ मानव संघर्ष को कम करने की दिशा में पहला कदम है। रिसर्च आधारित समाधानों को सामुदायिक जुड़ाव से जोड़ कर ऐसा भविष्य बनाया जा सकता है जहां मनुष्य और तेंदुए एक साथ सुरक्षित रूप से सह अस्तित्व में रहें।

शोध और शोध करने का तरीका

यह समझने के लिए कि तेंदुए किस प्रकार के परिदृश्य का उपयोग करते हैं, इसके लिए शोधकर्ताओं ने पूरे क्षेत्र में मल, पैरों के निशान, खरोंच और पंजों के निशान का उपयोग करके तेंदुए की उपस्थिति का मानचित्रण किया। यह पाया गया कि 68 प्रतिशत हिस्सों पर तेंदुओं की उपस्थिति है और घनी वनस्पति वाले हिस्से में अधिक व मानव निवास वाले क्षेत्रों में सबसे कम है। जनवरी 2009 से मार्च 2016 तक हुए 171 हमलों को अध्ययन को आधार बनाया गया, जिनमें अधिकतर हमले चाय बागानों में हुए थे। ज्यादातर हमले कुछ खास चाय बागानों तक सीमित थे और जनवरी से मई के बीच दर्ज किए गए।

इस रिसर्च का अरित्रा क्षेत्री, श्रीनिवास वैद्यनाथन और विद्या अत्रेया ने किया और लिखा है। शोधकर्ताओं ने पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के 630 वर्ग किमी के तेंदुए के हमलों को तरीकों की पड़ताल की। इसके लिए वन विभाग के 171 मुआवजा रिकार्ड का विश्लेषण करके, तेंदुओं के प्रमुख हमलों के पैटर्न की पड़ताल की गई। पड़ताल में पाया गया कि 89 में 83 हमले जनवरी और मई के बीच चाय बागानों में हुए। इस वक्त चाय का उत्पादन कम होता है।

Photo Credit – https://www.twinkl.pt/teaching-wiki/leopard


अधिकतर हमले सुबह 10 बजे से दिन के दो बजे के बीच हुए जो बागानों के कामकाजी घंटों से मेल खाते हैं। इस दौरान चाय श्रमिक बागानों में अधिक सक्रिय रहते हैं। 20 हमले इस दौरान ही हुए। हमलों के सबसे अधिक शिकार पुरुष पाए गए। पशुपालकों 16 प्रतिशत, चाय बागान में घूमने वाले 16 प्रतिशत व वन उत्पाद एकत्रित करने वाले 9 प्रतिशत हमलों के शिकार हुए। घने वनस्पति वाले क्षेत्रों में तेंदुओं की मौजूदगी अधिक पाई गई और जहां घरों का घनत्व अधिक था, वहां कम थी, लेकिन हमलों की उपस्थिति से उसका सीधा संबंध नहीं था।

भारत में चार प्रकार की बड़ी बिल्लियां, तेंदुआ सबसे अधिक अनुकूलन क्षमता वाला

अध्ययन में उल्लेख है कि भारत में अभी भी चार बड़ी बिल्लियां मौजूद हैं, जिनमें बाघ (पैंथेरा टाइग्रिस), शेर (पैंथेरा लियो), हिम तेंदुआ (पैंथेरा उन्शिया) और सामान्य तेंदुआ (पैंथेरा पार्डस) सहित अधिकांश बड़ी मांसाहारी प्रजातियाँ मौजूद हैं। इनकी मौजूदगी इस स्थिति के बावजूद है कि यहां मानव जनसंख्या का घनत्व बहुत अधिक है। ये चारों प्रजातियां अपने-अपने क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में मनुष्यों के साथ स्थान साझा करती है और इससे संभावित रूप से संघर्ष हो सकता है। अगर इस संघर्ष या टकराव का हल नहीं हुआ तो यह संरक्षण लक्ष्यों को गंभीर रूप से कमजोर कर सकता है और मानव जीवन और आजीविका को प्रभावित कर सकता ह।

भारत में चार बड़ी बिल्लियों में से तेंदुआ सबसे अधिक अनुकूलनीय है और इसका वितरण बहुत व्यापक है, जो पुराने संरक्षित जंगलों से लेकर शहरी परिदृश्यों के किनारों तक विभिन्न प्रकार के आवासों में रहता है।

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