ओलचिकी को मिले गौरव को लेकर मरांग बुरू की विशेष पूजा का आयोजन, राष्ट्रपति का जताया आभार

दुमका : संताली भाषा की लिपि ओलचिकी के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में तथा इसके आविष्कारक गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू के सम्मान में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा ऐतिहासिक पहल की गई। 25 दिसंबर 2025 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में संताली भाषा की ओलचिकी लिपि में भारत का संविधान जारी किया गया। अब संताल समाज के लोग देश के संविधान को आसानी से अपनी मातृभाषा में समझ सकेंगे। इसके अतिरिक्त 16 फरवरी 2026 को गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू के नाम पर डाक टिकट तथा 100 रुपये का स्मारक सिक्का जारी किया गया। जारी डाक टिकट और स्मारक सिक्के पर पंडित रघुनाथ मुर्मू का चित्र तथा ओलचिकी लिपि के अक्षर अंकित हैं।

इस ऐतिहासिक उपलब्धि के अवसर पर 136 वर्ष पुराने दुमका के ऐतिहासिक राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव के अंतिम दिन हिजला मेला परिसर स्थित संताल आदिवासियों के पूज्य एवं ऐतिहासिक स्थल ‘दिसोम मरांग बुरु थान’ में संताल समाज के ओर से विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया गया।

संताल समुदाय में एक अदभुत समानता है, किसी भी शुभ मौके पर बिना किसी भेदभाव के महिला-पुरुष, बच्चे-बूढे सभी इकट्ठा होकर उत्सव मनाते हैं।

ज्ञात हो कि ओलचिकी लिपि का आविष्कार वर्ष 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू द्वारा किया गया था। यह संताली भाषा की आधिकारिक लेखन प्रणाली है। संताली भाषा भारत की मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय भाषाओं में शामिल एक प्रमुख जनजातीय भाषा है, जिसे वर्ष 2003 में 92वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। यह मुख्य रूप से झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम और बिहार में व्यापक रूप से बोली जाती है। इसके अतिरिक्त नेपाल, बांग्लादेश आदि देशों में भी बोली जाती है। ग्रामीणों ने कहा कि संताली भाषा और ओलचिकी लिपि केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी समृद्ध आदिवासी संस्कृति, परंपराओं, इतिहास और पहचान की जीवंत अभिव्यक्ति है।

पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओलचिकी लिपि के माध्यम से संताली भाषा को जो सम्मान और संरचना प्रदान की, वह समाज के लिए एक अमूल्य धरोहर है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा इस ऐतिहासिक पहल के लिए संताल समाज ने आभार व्यक्त करते हुए इसे पूरे भारत के आदिवासी समुदाय के लिए गर्व का क्षण बताया।

पूजा-अर्चना के उपरांत सभी ग्रामीणों ने प्रसाद ग्रहण किया, मिठाई बाँटी गयी तथा मांदर की थाप पर पारंपरिक नृत्य-गान प्रस्तुत कर अपनी खुशी और सांस्कृतिक एकता का उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर इमानुवेल हांसदा, मुंशी हेंब्रम, सीतल मरांडी, संतोष हांसदा, बाबुराम मुर्मू, बादल मुर्मू, सुशील मुर्मू, राजेन्द्र बासकी, ऐमेल मरांडी, परेश मुर्मू, सुभाष किस्कू, राजाधन हेंब्रम, सिरजोन मरांडी, सुभाष मुर्मू, पोरेस मुर्मू, सुनील टुडू, सुशील मुर्मू, अर्जुन मुर्मू, आदित्य हांसदा, विकास टुडू, लुकेश हांसदा, लखीराम हांसदा, शिबू टुडू, काजोली मरांडी, निकिता मुर्मू जीयामुनी मुर्मू, नन्दलाल सोरेन, बाबुसोल मुर्मू, अनिल सोरेन, मकलू मुर्मू, मकु टुडू, श्रीकिनी मुर्मू, मकु टुडू, सीता हेम्ब्रोम, सुनीता सोरेन, नीलमनी बेसरा, बसंती टुडू, संजय सोरेन, पीयूष हेम्ब्रोम, संतोष के साथ काफी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे।

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